जानें काले और सफेद रंग के ही क्यों होते हैं मोबाइल चार्जर!: पीछे छिपा हैं साइंस, सेफ्टी और करोड़ों का बिजनेस...असली वजह जानकर हो जाएंगे हैरान?
जानें काले और सफेद रंग के ही क्यों होते हैं मोबाइल चार्जर!

तकनीकी/लाइफस्टाइल: आपने शायद ही कभी इस बात पर ध्यान दिया हो कि चाहे स्मार्टफोन किसी भी रंग का हो, उसके साथ मिलने वाला चार्जर ज्यादातर काले (Black) या सफेद (White) रंग का ही होता है। लाल, नीला, हरा या पीला चार्जर शायद ही देखने को मिलता है। क्या यह सिर्फ डिजाइन का मामला है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक और व्यावसायिक कारण भी है? दरअसल, चार्जर का रंग तय करने के पीछे साइंस, सुरक्षा, उत्पादन लागत और ग्राहकों की सुविधा जैसे कई अहम कारण जुड़े हुए हैं।

क्या सिर्फ डिजाइन की वजह से चुने जाते हैं ये रंग?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। चार्जर का रंग केवल दिखावे के लिए नहीं चुना जाता। कंपनियां किसी भी रंग का चार्जर बना सकती हैं, लेकिन अधिकांश कंपनियां ब्लैक और व्हाइट रंग को प्राथमिकता देती हैं क्योंकि यही रंग उत्पादन, सुरक्षा और उपयोग के लिहाज से सबसे व्यावहारिक माने जाते हैं।

ब्लैक चार्जर क्यों बनाए जाते हैं?

आपको बता दें कि ब्लैक रंग लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि ब्लैक प्लास्टिक आसानी से उपलब्ध होता है और बड़े पैमाने पर उत्पादन में अपेक्षाकृत किफायती पड़ता है। इसके अलावा ब्लैक सतह गर्मी के आदान-प्रदान में प्रभावी मानी जाती है। चार्जिंग के दौरान बनने वाली गर्मी को बाहर निकालने में इसका व्यवहार स्थिर रहता है। यही कारण है कि कई कंपनियां आज भी ब्लैक चार्जर को प्राथमिकता देती हैं।

सफेद चार्जर क्यों होते हैं?

गौरतलब है कि समय के साथ कई कंपनियों ने सफेद चार्जर देना शुरू किया। सफेद रंग साफ-सुथरा और प्रीमियम लुक देता है, इसलिए कई ब्रांड इसे अपनी डिजाइन पहचान का हिस्सा बनाते हैं। सफेद सतह बाहरी गर्मी को अपेक्षाकृत कम अवशोषित करती है। हालांकि चार्जर की सुरक्षा केवल रंग पर नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक डिजाइन, सर्किट और गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

सेफ्टी भी है बड़ी वजह

मोबाइल चार्जर बाजार में आने से पहले उन्हें कई सुरक्षा परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। इनमें शॉर्ट सर्किट, ओवरहीटिंग, फायर सेफ्टी और इलेक्ट्रिकल सुरक्षा जैसे टेस्ट शामिल होते हैं। ब्लैक और व्हाइट रंग वाले प्लास्टिक कंपाउंड लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे हैं और इनकी गुणवत्ता पहले से प्रमाणित होती है। इससे कंपनियों के लिए सुरक्षा मानकों का पालन करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।

बिजनेस का भी है बड़ा गणित

अगर हर मोबाइल के रंग के हिसाब से अलग-अलग रंग के चार्जर बनाए जाएं तो कंपनियों को कई तरह के प्लास्टिक, अलग उत्पादन लाइन और अलग स्टॉक रखना पड़ेगा। इससे निर्माण लागत और सप्लाई चेन दोनों महंगी हो जाएंगी। यही वजह है कि कंपनियां सीमित रंगों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान और लागत नियंत्रित रहती है।

ग्राहकों को भी मिलता है फायदा

सिर्फ कंपनियों को ही नहीं, ग्राहकों को भी इसका फायदा मिलता है। यदि चार्जर खराब हो जाए तो ब्लैक या व्हाइट चार्जर बाजार में आसानी से मिल जाता है। अगर हर फोन के साथ अलग रंग का चार्जर होता, तो सही रंग वाला चार्जर ढूंढना मुश्किल हो सकता था।

साइंस क्या कहती है?

विदित है कि चार्जिंग के दौरान चार्जर के अंदर बिजली का रूपांतरण होता है, जिससे गर्मी पैदा होती है। विशेषज्ञों के अनुसार चार्जर की हीट मैनेजमेंट में सबसे बड़ी भूमिका उसकी आंतरिक डिजाइन, सर्किट, वेंटिलेशन और इस्तेमाल किए गए मैटेरियल की होती है। रंग का असर सीमित होता है, लेकिन ब्लैक और व्हाइट दोनों रंग लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए व्यावहारिक और भरोसेमंद विकल्प माने जाते हैं।

आखिर चार्जर काम कैसे करता है?

घरों में मिलने वाली बिजली AC (Alternating Current) होती है, जबकि मोबाइल फोन की बैटरी DC (Direct Current) पर काम करती है। चार्जर का मुख्य काम AC बिजली को DC में बदलना और सुरक्षित मात्रा में फोन की बैटरी तक पहुंचाना होता है। इसी प्रक्रिया के दौरान थोड़ी गर्मी पैदा होती है, इसलिए चार्जर की डिजाइन और गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती है।

मोबाइल चार्जर का ब्लैक या व्हाइट होना कोई संयोग नहीं है। इसके पीछे सुरक्षा मानक, उत्पादन लागत, ग्राहकों की सुविधा, ब्रांड डिजाइन और वैज्ञानिक कारण जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि आज भी दुनिया की ज्यादातर कंपनियां अपने चार्जर इन्हीं दो रंगों में बाजार में उतारती हैं।

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