स्वास्थ्य : अक्सर आपने देखा होगा कि लोग होम्योपैथी की छोटी-छोटी, मीठी गोलियों पर भरोसा करते हैं। सर्दी-जुकाम हो या फिर एलर्जी, माइग्रेन हो या पाचन की समस्या, लोग बिना झिझक होम्योपैथिक दवाएं लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि चीनी जैसी दिखने वाली ये छोटी गोलियां आखिर कैसे बड़ी-बड़ी बीमारियों को ठीक कर देती हैं? आइए, आज जानते हैं होम्योपैथी के इसी रहस्य को, ये दवाएं कैसे काम करती हैं, किन बीमारियों में है असरदार और क्या है इस 200 साल पुरानी चिकित्सा पद्धति का पूरा सच।
होम्योपैथी का इतिहास और सिद्धांत
आपको बता दें कि होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति को 18वीं शताब्दी के अंत में जर्मन चिकित्सक डॉ. सैमुअल हैनिमैन ने जन्म दिया था। यह चिकित्सा पद्धति “समरूपता के सिद्धांत” पर आधारित है। समरूपता के सिद्धांत का मतलब है कि जो पदार्थ स्वस्थ व्यक्ति में बीमारी के लक्षण पैदा कर सकता है, वही पदार्थ बहुत कम मात्रा में उसी बीमारी को ठीक भी कर सकता है। यानी जिस चीज से बीमारी हो, उसी की अति-सूक्ष्म मात्रा से इलाज। यही होम्योपैथी का मूल मंत्र है।
होम्योपैथी की दवाएं कैसे काम करती हैं?
गौरतलब है कि होम्योपैथी की दवाएं आम दवाओं की तरह सीधे लक्षणों को दबाने का काम नहीं करतीं। बल्कि ये शरीर की खुद की हीलिंग पावर (प्रतिरक्षा प्रणाली) को जगाने का काम करती हैं। दवाएं बनाने की प्रक्रिया को “पोटेंटाइजेशन” कहते हैं। जिसमें किसी पदार्थ (पौधा, खनिज, यहां तक कि जहर) को पानी या अल्कोहल में बार-बार पतला किया जाता है। बार-बार पतला करने से पदार्थ की उपचारात्मक शक्ति बढ़ती जाती है। एक उदाहरण से समझिए कि प्याज काटने से आंखों में पानी आता है और नाक बहने लगती है, इसलिए होम्योपैथी में प्याज का अर्क एलर्जी और जुकाम की दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। विदित है कि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि होम्योपैथिक दवाएं नैनोमेडिसिन की तरह काम करती हैं यानी अति-सूक्ष्म कण शरीर की कोशिकाओं पर असर डालते हैं।
किन बीमारियों में असरदार है होम्योपैथी?
आपको बता दें कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एलर्जी, चोट के निशान, क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (लगातार थकान), सर्दी-जुकाम, खांसी, डिप्रेशन (सहायक चिकित्सा के रूप में), सिरदर्द, पाचन संबंधी समस्याएं, माइग्रेन और दांत के दर्द में होम्योपैथी काफी असरदार मानी जाती है। हालांकि कैंसर, हार्ट अटैक, डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों में होम्योपैथी को अकेले इलाज के रूप में नहीं, बल्कि एलोपैथी के साथ पूरक चिकित्सा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
क्या होम्योपैथी पर भरोसा किया जा सकता है?
गौरतलब है कि होम्योपैथी को लेकर दुनिया में दो राय हैं। एक तरफ यह सस्ती और सुलभ है, ज्यादातर मामलों में बिना साइड इफेक्ट के है और लंबे समय से इस्तेमाल में है। दूसरी तरफ कुछ लोग इसमें वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी बताते हैं, अति-पतला करने के तरीके पर सवाल उठाते हैं और कुछ अध्ययनों में इसे प्लेसबो (डमी दवा) से बेहतर नहीं पाया गया है। विदित है कि मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, ज्यादातर होम्योपैथिक दवाएं नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं। बिना सही डायग्नोसिस के कोई भी दवा लेना खतरनाक हो सकता है।
सावधानी जरूरी है
आपको बता दें कि गंभीर बीमारियों में केवल होम्योपैथी पर निर्भर न रहें। हमेशा योग्य होम्योपैथिक डॉक्टर की सलाह लें। सेल्फ-मेडिकेशन से बचें और अगर कोई दवा असर नहीं कर रही, तो डॉक्टर से संपर्क करें।
200 साल से भी ज्यादा समय से होम्योपैथी लाखों लोगों की जिंदगी का हिस्सा रही है। चीनी जैसी दिखने वाली ये छोटी गोलियां अपने सिद्धांत, सुरक्षा और किफायती होने के कारण लोकप्रिय हैं। विज्ञान की दुनिया में इस पर बहस जारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसने लोगों को राहत दी है, चाहे वह सर्दी-जुकाम हो या फिर एलर्जी, माइग्रेन हो या पाचन की समस्या। बस जरूरत है तो इसका सही तरीके से और विशेषज्ञ की देखरेख में इस्तेमाल करने की।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट चिकित्सा शोध, जनरल जानकारी और विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श ज़रूर करें। NCR पत्रिका इसकी सटीकता या व्यक्तिगत असर की जिम्मेदारी नहीं लेता।