पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश!: घायलों का इलाज कराये दिल्ली सरकार, वहीं इसका प्रयोग तभी करें जब...जानें क्या होती पैलेट गन और इसके इस्तेमाल पर क्या कहता भारत और संयुक्त राष्ट्र का कानून_एक नजर
पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश!

नई दिल्ली: छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के हथियारों और गोला-बारूद के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। साथ ही दिल्ली सरकार को निर्देश दिया गया है कि आंदोलन के दौरान घायल हुए लोगों, विशेषकर पैलेट गन से घायल होने का दावा करने वालों का समुचित इलाज सुनिश्चित किया जाए। गौरतलब है कि इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा नियमों के तहत पुलिस और सुरक्षा बल विशेष परिस्थितियों में पैलेट गन का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, किसी विशेष घटना में इसका उपयोग नियमों के अनुरूप हुआ या नहीं, इसकी न्यायिक जांच की जा सकती है।

क्या है पूरा मामला?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाल ही में NEET परीक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाए जाने के आरोप लगे थे। शुरुआत में दिल्ली पुलिस ने ऐसे आरोपों से इनकार किया था, लेकिन बाद में सामने आई जानकारी के अनुसार रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की आंतरिक जांच में यह सामने आया कि एक जवान ने प्रदर्शन के दौरान सात राउंड फायर किए थे। इस घटना के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिका में पैलेट गन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने, घायल लोगों को मुआवजा देने और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि केवल पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग पर्याप्त नहीं है, क्योंकि वर्तमान में पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD) के दिशा-निर्देश विशेष परिस्थितियों में इसके इस्तेमाल की अनुमति देते हैं। अदालत ने कहा कि यदि किसी विशेष घटना में यह आरोप है कि बल प्रयोग आवश्यकता से अधिक था या नियमों के विरुद्ध किया गया, तो उस घटना की वैधता की जांच की जा सकती है।

घायलों के इलाज का निर्देश

विदित है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि प्रदर्शन के दौरान घायल हुए सभी लोगों को आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए। विशेष रूप से उन लोगों का उचित इलाज कराया जाए, जिन्होंने पैलेट गन से घायल होने का दावा किया है।

RAF को लेकर कोर्ट का अहम निर्देश

सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि जंतर-मंतर पर तैनात रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों, कारतूसों और गोला-बारूद का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए। इससे भविष्य में जांच के दौरान यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि किस परिस्थिति में कितना बल प्रयोग किया गया था।

आखिर पैलेट गन क्या होती है?

पैलेट गन ऐसा हथियार है जिससे एक साथ कई छोटे-छोटे धातु, रबर या प्लास्टिक के छर्रे निकलते हैं। इसे मुख्य रूप से भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे सामान्य गोली की तुलना में कम घातक माना जाता है, लेकिन यदि छर्रे आंख, सिर या गर्दन जैसे संवेदनशील हिस्सों पर लग जाएं तो गंभीर चोट या स्थायी नुकसान भी हो सकता है। इसी वजह से वर्षों से इसके इस्तेमाल को लेकर मानवाधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच बहस चलती रही है।

क्यों होता है इतना विवाद?

भारत में पैलेट गन को लेकर सबसे बड़ा विवाद वर्ष 2016 में जम्मू-कश्मीर में सामने आया था। उस समय हिंसक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने और कई लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित होने के मामले सामने आए थे। इसके बाद मानवाधिकार संगठनों ने इसके इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए। हालिया दिल्ली घटना के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

क्या कहता है भारतीय कानून?

भारत में ऐसा कोई अलग कानून नहीं है जो पैलेट गन को सीधे वैध या अवैध घोषित करता हो। इसका इस्तेमाल पुलिस और अर्धसैनिक बलों के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP), प्रशासनिक दिशा-निर्देशों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जुड़े नियमों के तहत किया जाता है। भारतीय संविधान के अनुसार किसी भी सरकारी बल प्रयोग में आवश्यकता, अनुपातिकता और न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांत का पालन किया जाना अनिवार्य माना जाता है।

सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार का कहना है कि पैलेट गन जान लेने के उद्देश्य से नहीं बल्कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। अधिकारियों के अनुसार यह अंतिम विकल्प होता है और इससे पहले आंसू गैस, वॉटर कैनन तथा अन्य कम घातक उपाय अपनाए जाते हैं।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

दूसरी ओर कई मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि पैलेट गन के छर्रे कई दिशाओं में फैलते हैं, जिससे प्रदर्शनकारियों के अलावा आसपास मौजूद आम लोग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। उनका कहना है कि इससे स्थायी चोट और आंखों की रोशनी जाने जैसी गंभीर घटनाएं हो सकती हैं, इसलिए इसके इस्तेमाल को और सख्त नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पैलेट गन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने केवल यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान नियमों के तहत विशेष परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन हर मामले में यह जांच की जा सकती है कि बल प्रयोग आवश्यक, उचित और निर्धारित नियमों के अनुरूप था या नहीं।

अब सभी की निगाहें इस जांच पर टिकी हैं कि दिल्ली में छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन का इस्तेमाल तय नियमों के अनुसार हुआ था या नहीं। जांच के निष्कर्ष आने के बाद इस पूरे मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई और जिम्मेदारी तय होने की संभावना है।

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