नई दिल्ली: देश की पुलिस व्यवस्था और आपराधिक जांच प्रणाली में अब एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फैसला किया है कि 1 जनवरी 2027 से देशभर में एफआईआर दर्ज होने से लेकर चार्जशीट दाखिल होने तक पूरी जांच प्रक्रिया डिजिटल होगी। इसका मतलब है कि हर पुलिस केस का रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक रूप से तैयार और सुरक्षित रखा जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे जांच तेज, पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी, जबकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने में भी मदद मिलेगी।
गौरतलब है कि 1 जुलाई 2024 से देश में तीन नए आपराधिक कानून लागू किए गए थे। इनमें भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) शामिल हैं। इन कानूनों ने ब्रिटिश काल के IPC, CrPC और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह ली थी। अब इन कानूनों के लागू होने के दो वर्ष पूरे होने पर गृह मंत्रालय ने डिजिटल इन्वेस्टिगेशन को अगला बड़ा कदम बताया है।
आपको बता दें कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद किसी भी आपराधिक मामले में दर्ज की गई एफआईआर, केस डायरी, गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और चार्जशीट तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज होगी। इससे जांच अधिकारियों को रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में आसानी होगी और दस्तावेजों के गुम होने या छेड़छाड़ की संभावना भी काफी कम हो जाएगी।
गृह मंत्रालय के अनुसार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 31 दिसंबर 2026 तक आवश्यक तकनीकी ढांचा तैयार किया जाएगा। इसके बाद 1 जनवरी 2027 से डिजिटल जांच प्रणाली पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। पुलिस थानों में केस डायरी भी पूरी तरह पेपरलेस होगी।
सरकार के मुताबिक नए कानून लागू होने के बाद जांच प्रक्रिया पहले से अधिक व्यवस्थित हुई है। डिजिटल व्यवस्था अपनाने से अब तक मामलों की जांच में औसतन करीब 25 प्रतिशत समय की बचत दर्ज की गई है। केस की पूरी टाइमलाइन अब केंद्रीकृत प्रणाली से मॉनिटर की जा रही है, जिससे अनावश्यक देरी कम हुई है।
विदित है कि नई व्यवस्था के बाद जीरो FIR का भी व्यापक इस्तेमाल बढ़ा है। पिछले दो वर्षों में देशभर में 63 हजार से अधिक जीरो FIR दर्ज की गईं। इस सुविधा के तहत कोई भी पीड़ित देश के किसी भी पुलिस थाने में मामला दर्ज करा सकता है। बाद में संबंधित थाने या राज्य को केस ट्रांसफर कर दिया जाता है। इससे पीड़ितों को तत्काल कानूनी मदद मिलना आसान हुआ है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले दो वर्षों में देशभर में 74.66 लाख से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं। वहीं तय समय में चार्जशीट दाखिल करने की दर में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
नई व्यवस्था में वैज्ञानिक और फोरेंसिक जांच को अधिक महत्व दिया गया है। डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से जांच की गुणवत्ता बेहतर हुई है। सरकार का मानना है कि इससे दोषियों तक जल्दी पहुंचना आसान होगा और बेगुनाहों के फंसने की संभावना भी कम होगी।
आपको बता दें कि गृह मंत्रालय के अनुसार तीनों नए कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में हरियाणा, गोवा, असम, चंडीगढ़ और पंजाब सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल हैं। इन राज्यों में डिजिटल पुलिसिंग और नई कानूनी प्रक्रियाओं को तेजी से लागू किया गया है।
डिजिटल इन्वेस्टिगेशन लागू होने के बाद लोगों को बार-बार थानों के चक्कर लगाने की जरूरत कम पड़ेगी। जांच प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी, रिकॉर्ड सुरक्षित रहेंगे, दस्तावेजों की निगरानी आसान होगी और मामलों के निस्तारण में लगने वाला समय भी कम होगा। सरकार का दावा है कि यह बदलाव देश की न्याय व्यवस्था को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और नागरिक केंद्रित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।