लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बीच अब योगी सरकार ने बड़ा और सख्त फैसला लिया है। प्रदेश सरकार ने साफ आदेश जारी कर दिया है कि अब सरकारी अफसरों और कर्मचारियों को सांसदों और विधायकों का “पूरा सम्मान” करना होगा।
जानें क्या है नया आदेश?
आपको बता दें कि नये आदेश के अनुसार अगर कोई जनप्रतिनिधि दफ्तर पहुंचे तो अधिकारी:
इतना ही नहीं फोन कॉल मिस करने पर बाद में कॉल बैक करना भी अनिवार्य होगा।
फोन नहीं उठाया तो हो सकती है कार्रवाई
गौरतलब है कि प्रदेश के मुख्य सचिव शशि प्रकाश गोयल की ओर से जारी शासनादेश में कहा गया है कि सांसदों और विधायकों की लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि अधिकारी:
इसी के बाद सरकार को यह सख्त आदेश जारी करना पड़ा।
अब मोबाइल में सेव करने होंगे सांसद-विधायकों के नंबर
नए आदेश के मुताबिक सभी अधिकारी अपने मोबाइल में सांसदों और विधायकों के नंबर सेव करेंगे। कॉल आने पर तुरंत रिसीव करेंगे। व्यस्त होने पर मैसेज भेजेंगे और बाद में कॉल बैक करना होगा। सरकार ने इसे “प्रोटोकॉल और लोकतांत्रिक मर्यादा” का हिस्सा बताया है।
15 बार आदेश जारी हुए, फिर भी नहीं बदला सिस्टम!
विदित है कि शासनादेश में दावा किया गया है कि 2017 से फरवरी 2026 तक कुल 15 बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन उसके बावजूद जनप्रतिनिधियों के फोन नहीं उठाने, उनकी अनदेखी करने, सम्मान न देने की शिकायतें लगातार आती रहीं। सरकार ने इसे “बेहद खेदजनक” स्थिति बताया है।
अब नहीं माना आदेश तो होगी सख्त कार्रवाई
सरकार ने साफ कर दिया है कि: अगर कोई अधिकारी सम्मानजनक व्यवहार नहीं करता, कॉल रिसीव नहीं करता और शिकायतों का समाधान नहीं करता तो उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली के तहत कार्रवाई होगी।
आखिर सरकार को यह आदेश क्यों जारी करना पड़ा?
आपको बता दें कि प्रदेश में लंबे समय से कई सांसद और विधायक यह आरोप लगाते रहे हैं कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते, क्षेत्रीय समस्याओं पर ध्यान नहीं देते और फोन तक नहीं उठाते। यह मामला विधानसभा और राजनीतिक मंचों पर कई बार उठ चुका है। सरकार का मानना है कि जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए प्रशासन को उनके साथ समन्वय और सम्मानजनक व्यवहार रखना चाहिए।
अखिलेश यादव ने कसा तंज
इस फैसले के बाद Akhilesh Yadav ने सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा “इज्जत फरमान से नहीं, अच्छे काम से मिलती है।” इसके बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
दफ्तरों का बदल जाएगा माहौल?
सरकारी गलियारों में अब इस आदेश की खूब चर्चा हो रही है। कई अधिकारी इसे अनुशासन और समन्वय बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं, तो वहीं विपक्ष इसे “सम्मान का सरकारी फरमान” कहकर सवाल उठा रहा है।
योगी सरकार का यह आदेश साफ संकेत देता है कि अब प्रदेश में जनप्रतिनिधियों की अनदेखी, फोन न उठाना और दफ्तरों में उपेक्षा भारी पड़ सकती है। सरकार प्रशासन और राजनीति के बीच तालमेल मजबूत करने की कोशिश में दिख रही है, लेकिन आने वाले दिनों में यह आदेश कितना प्रभावी साबित होगा, इस पर सबकी नजर रहेगी।