अमेरिका में H-1B वीजा नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी!: 1 अप्रैल से लागू होगा नया फॉर्म I-129, अब लॉटरी नहीं इस आधार पर होगा चयन, जानें क्या है H-1B वीजा और भारतीय प्रोफेशनल्स पर इस बदलाव का असर?
अमेरिका में H-1B वीजा नियमों में बड़े बदलाव की तैयारी!

वाशिंगटन : अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले लाखों विदेशी पेशेवरों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। अमेरिका ने H-1B वीजा की चयन प्रक्रिया में अहम बदलाव करने का फैसला लिया है। अब तक जहां इस वीजा के लिए उम्मीदवारों का चयन रैंडम लॉटरी सिस्टम से किया जाता था, वहीं अब नई व्यवस्था में नौकरी के वेतन (सैलरी) को प्राथमिक आधार बनाया जाएगा। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) ने इसके लिए फॉर्म I-129 का नया संस्करण जारी किया है, जिसे 1 अप्रैल 2026 से अनिवार्य कर दिया जाएगा। इस बदलाव के बाद कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका बुलाने के लिए पहले से ज्यादा विस्तृत जानकारी देनी होगी।

अब वेतन के आधार पर तय होगा चयन

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नई प्रणाली के तहत H-1B वीजा के आवेदकों को चार वेतन स्तरों (लेवल-1 से लेवल-4) में विभाजित किया जाएगा।

•लेवल-1: शुरुआती या कम अनुभव वाली नौकरियां
•लेवल-2: कुछ अनुभव वाले प्रोफेशनल्स
•लेवल-3: अनुभवी विशेषज्ञ
•लेवल-4: उच्च कौशल और वरिष्ठ पदों वाले उम्मीदवार

चयन प्रक्रिया में उच्च वेतन स्तर वाले उम्मीदवारों को ज्यादा मौके मिलेंगे। उदाहरण के तौर पर:

•लेवल-4 उम्मीदवारों को चार अवसर
•लेवल-3 को तीन अवसर
•लेवल-2 को दो अवसर
•लेवल-1 को सिर्फ एक अवसर

इसका मतलब है कि ज्यादा वेतन वाली नौकरियों के लिए आवेदन करने वालों की चयन संभावना पहले से ज्यादा होगी।

कंपनियों को देनी होगी ज्यादा जानकारी

गौरतलब है कि फॉर्म I-129 में किए गए बदलाव के बाद कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन करते समय कई अतिरिक्त जानकारी देनी होगी। उन्हें यह बताना होगा:

•नौकरी के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता क्या है
•किस विषय में पढ़ाई जरूरी है
•उस पद के लिए कितना अनुभव आवश्यक है
•क्या उस पद में टीम या कर्मचारियों की जिम्मेदारी शामिल है

इसका उद्देश्य चयन प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और व्यवस्थित बनाना बताया जा रहा है।

भारतीयों पर पड़ सकता है सबसे बड़ा असर

विदित है कि H-1B वीजा का सबसे ज्यादा फायदा भारतीय पेशेवरों को मिलता रहा है। आंकड़ों के अनुसार हर साल जारी होने वाले कुल H-1B वीजा में से करीब 70% भारतीयों को मिलते हैं। भारत से बड़ी संख्या में आईटी इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और टेक विशेषज्ञ अमेरिका की कंपनियों में काम करते हैं। इंफोसिस, TCS, विप्रो, कॉग्निजेंट और HCL जैसी कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा H-1B वीजा स्पॉन्सर करती हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद हाई-स्किल और हाई-सैलरी वाले भारतीय प्रोफेशनल्स को फायदा हो सकता है, जबकि एंट्री-लेवल उम्मीदवारों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है।

वीजा फीस में भी हुआ बड़ा बदलाव

आपको बता दें कि H-1B वीजा को लेकर हाल के वर्षों में फीस भी काफी बढ़ाई गई है। पहले फीस लगभग 9,000 डॉलर थी। 2025 में इसे बढ़ाकर करीब 1 लाख डॉलर कर दिया गया। फीस बढ़ने के कारण कई कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को हायर करना महंगा हो गया है।

क्या होता है H-1B वीजा और इसकी अवधि

H-1B वीजा आमतौर पर 3 साल के लिए जारी किया जाता है, जिसे बाद में 3 साल और बढ़ाया जा सकता है। यानी कुल मिलाकर व्यक्ति 6 साल तक अमेरिका में काम कर सकता है। इसके बाद योग्य उम्मीदवार ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं, जो स्थायी निवास का रास्ता खोलता है।

ट्रम्प प्रशासन का बदलता रुख

गौरतलब है कि H-1B वीजा को लेकर अमेरिकी राजनीति में लंबे समय से बहस होती रही है। कुछ नेताओं का मानना है कि इससे विदेशी प्रतिभाओं को मौका मिलता है, जबकि कुछ इसे अमेरिकी नौकरियों के लिए चुनौती मानते हैं। हाल के वर्षों में इस नीति पर कभी सख्ती और कभी राहत देखने को मिली है। एक तरफ वीजा फीस बढ़ाई गई, तो दूसरी ओर यह भी कहा गया कि अमेरिका को कुशल प्रतिभाओं की जरूरत है।

इमिग्रेशन विशेषज्ञों का मानना है कि नई प्रणाली लागू होने के बाद अमेरिका उच्च कौशल वाले पेशेवरों को प्राथमिकता देगा। इससे टेक, इंजीनियरिंग और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले अनुभवी उम्मीदवारों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, फीस बढ़ने और नियमों में बदलाव के कारण कुछ प्रतिभाएं कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और मध्य-पूर्व जैसे विकल्पों की ओर भी रुख कर सकती हैं।

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