लखनऊ : लगभग नौ साल से मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे शिक्षामित्रों के लिए आखिरकार बड़ी राहत की खबर आ गई। विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने की घोषणा कर दी। एक अप्रैल से यह फैसला लागू होगा। 2017 में अदालतों से समायोजन निरस्त होने के बाद जिन शिक्षामित्रों का वेतन 35-40 हजार रुपये से घटकर सीधे 10 हजार रुपये रह गया था, अब उनके लिए यह फैसला किसी बड़ी जीत से कम नहीं माना जा रहा।
कैसे शुरू हुआ था संघर्ष?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1999 में सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षामित्र योजना शुरू हुई। शुरुआत में 1450 रुपये मानदेय दिया जाता था। 2005-06 तक संख्या बढ़ी और बाद में ट्रेनिंग देकर नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। 2014-15 में दो चरणों में समायोजन हुआ और वेतन 35-40 हजार तक पहुंच गया। लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टीईटी पास न होने के आधार पर समायोजन रद्द हो गया। इसके बाद वे फिर से 10 हजार रुपये मानदेय पर आ गए। तब से शिक्षामित्र लगातार आंदोलन और वार्ता के जरिए मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे थे।
अब क्या बदला?
गौरतलब है कि सरकार ने मानदेय को लगभग दोगुना करने की घोषणा की है। इससे प्रदेश के करीब 1.43 लाख शिक्षामित्र परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा। साथ ही हाल ही में शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को भी पांच लाख रुपये तक की कैशलेस चिकित्सा सुविधा में शामिल किया गया है। इससे स्वास्थ्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
अनुदेशकों को भी राहत :
विदित है कि 2013-14 में जूनियर हाईस्कूल में कला, विज्ञान, कंप्यूटर और खेलकूद के लिए करीब 25 हजार अनुदेशकों की तैनाती हुई थी। शुरुआत में 7000 रुपये मानदेय दिया जाता था जो कि 2021 में बढ़कर 9000 रुपये हो गए थे। अब घोषणा के मुताबिक 17,000 रुपये तक बढ़ाने का फैसला किया गया है। यह फैसला लंबे समय से इंतजार कर रहे अनुदेशकों के लिए भी बड़ी राहत है।
क्यों अहम है यह फैसला?
सरकार के इस फैसले से लंबे समय से असंतोष झेल रहे शिक्षामित्रों में नई ऊर्जा मिली है। इससे ग्रामीण और प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। आर्थिक स्थिरता से शिक्षण गुणवत्ता पर सकारात्मक असर होगा। शिक्षामित्र संघ ने सरकार का आभार जताते हुए कहा है कि इस निर्णय से उनके परिवारों के जीवन स्तर में सुधार होगा और वे अधिक मनोयोग से पढ़ा सकेंगे।
2017 की कानूनी लड़ाई के बाद जो झटका शिक्षामित्रों को लगा था, वह अब कुछ हद तक संभलता दिख रहा है। नौ साल के संघर्ष के बाद मानदेय बढ़ोतरी का यह फैसला सिर्फ आर्थिक राहत नहीं, बल्कि सम्मान की वापसी के रूप में भी देखा जा रहा है।