देहरादून : पहाड़ों के राज्य उत्तराखंड के लिए राहत और विकास की बड़ी खबर सामने आई है। विश्व बैंक की मदद से राज्य के 16 शहरों में पेयजल व्यवस्था की तस्वीर बदलने जा रही है। केंद्र सरकार ने ₹1600 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत करीब 1 लाख घरों और लगभग 6 लाख लोगों को 24 घंटे स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। यह योजना केवल पानी की सप्लाई नहीं, बल्कि आधुनिक शहरी जीवन की बुनियाद मानी जा रही है।
क्या है इस मेगा प्लान की खासियत?
आपको बता दें कि इस मेगाप्लान की निम्नलिखित खासियत है-
●24×7 पानी की सप्लाई
●आधुनिक पाइपलाइन नेटवर्क
●लीकेज कंट्रोल और स्मार्ट मॉनिटरिंग
●हिल एरिया के अनुसार डिजाइन किया गया सिस्टम
●भविष्य की आबादी को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर
सरकार का मानना है कि इससे जल संकट, टैंकर निर्भरता और अनियमित सप्लाई जैसी समस्याएं खत्म होंगी।
तय हुआ टाइमलाइन, नहीं चलेगी देरी :
गौरतलब है कि पेयजल निगम को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि 3 महीने में टेंडर प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। केंद्र से अंतिम स्वीकृति मिलने के बाद 6 महीने के भीतर निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। यानी अब फाइलों में नहीं, जमीन पर काम दिखेगा।
किन शहरों को मिलेगा सबसे पहले फायदा?
आपको बता दें कि प्राथमिक सूची में शामिल शहरों में सेलाकुई, भवाली, भीमताल, गोपेश्वर, डोईवाला, बागेश्वर, रानीपोखरी, रामपुर, पाडली गुर्जर, पशुपतिनाथ क्षेत्र शामिल है।
वहीं इसके अलावा दूसरे चरण में-
हरिद्वार (इमसीखेड़ी)
रुद्रप्रयाग (उखीमठ, अगस्त्यमुनि, तिलवाड़ा)
उत्तरकाशी (पुरोला, बड़कोट, नौगांव)
चमोली (गैरसैंण, नंदप्रयाग)
ऊधमसिंह नगर और नैनीताल क्षेत्र शामिल है।
क्या कहते हैं अधिकारी?
आपको बता दें कि संजय सिंह, मुख्य अभियंता, पेयजल निगम का कहना है कि “प्राथमिक शहरों का चयन हो चुका है। प्रस्ताव अंतिम चरण में है। टेंडर प्रक्रिया पूरी होते ही प्रोजेक्ट केंद्र को भेजा जाएगा। यह योजना उत्तराखंड के शहरी भविष्य को सुरक्षित करेगी।”
सिर्फ पानी नहीं, विकास की धारा :
विशेषज्ञों के मुताबिक यह योजना स्वास्थ्य सुधार और महिलाओं का समय बचाने के साथ साथ पर्यटन और निवेश को बढ़ावा देगा। और शहरी पलायन पर लगाम जैसे कई सकारात्मक बदलाव लाएगी।
उत्तराखंड में पानी अब समस्या नहीं, सुविधा बनने जा रहा है। विश्व बैंक की यह ₹1600 करोड़ की योजना पहाड़ों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए जीवन बदलने वाला कदम साबित हो सकती है। अब नजरें टेंडर और निर्माण की रफ्तार पर टिकी हैं क्योंकि साफ पानी सिर्फ जरूरत नहीं, हक है।