नई दिल्ली : भारतीय रेलवे अब सिर्फ ट्रेनों और स्टेशनों का नेटवर्क नहीं, बल्कि “नए भारत” की नई पहचान बनने की तैयारी में है। देशभर के रेलवे स्टेशनों, दफ्तरों और रेलवे सिस्टम में अब उन तमाम प्रतीकों और परंपराओं को हटाया जाएगा, जो अंग्रेजों के शासन और गुलामी की याद दिलाते हैं। रेलवे बोर्ड ने सभी जोन को सख्त निर्देश दिए हैं कि 14 मई तक ब्रिटिश काल से जुड़े ऐसे चिन्ह, शब्द, प्रतीक और व्यवस्थाएं हटाने की प्रक्रिया तेज की जाए।
रेलवे में शुरू हुआ ‘डिकॉलोनाइजेशन अभियान’
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रेलवे बोर्ड के इस बड़े अभियान का मकसद भारतीय रेलवे को पूरी तरह “भारतीय पहचान” देना बताया जा रहा है। इसके तहत:
ब्रिटिश काल के प्रतीक हटेंगे
पुरानी अंग्रेजी परंपराएं खत्म होंगी
यूनिफॉर्म बदलेगी
पदनाम बदलेंगे
भाषा और कार्यशैली भारतीय स्वरूप में दिखाई देगी
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक यह सिर्फ बदलाव नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने की कोशिश है।
प्रयागराज का ऐतिहासिक ‘कोरल क्लब’ भी बदलेगा
गौरतलब है कि दिल्ली-हावड़ा रूट पर स्थित प्रयागराज का ऐतिहासिक “कोरल क्लब”, जो कभी अंग्रेज अफसरों और ब्रिटिश अधिकारियों का खास केंद्र माना जाता था, अब इस बदलाव का बड़ा प्रतीक बनने जा रहा है। यहां से ईस्ट इंडियन रेलवे का पुराना मेटल लोगो हटाया जाएगा। ब्रिटिशकालीन प्रतीकों को हटाकर भारतीय पहचान दी जाएगी। रेलवे इसे “गुलामी के अवशेष खत्म करने” की दिशा में अहम कदम मान रहा है।
अब बदलेगी रेलवे अधिकारियों की यूनिफॉर्म
वर्षों से रेलवे अधिकारियों की पहचान रहे “बंद गला कोट” को भी धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। अब अधिकारी बिजनेस सूट, सफेद शर्ट-पैंट और भारतीय रेलवे लोगो वाली स्वदेशी टाई में नजर आएंगे। गर्मी और भारतीय मौसम को देखते हुए खादी व सूती कपड़ों को प्राथमिकता दी जा रही है।
पीतल के बटन हटेंगे, लगेगा अशोक चक्र
विदित है कि रेलवे की पुरानी वर्दियों पर लगे ब्रिटिश स्टाइल पीतल के बटन अब इतिहास बनने वाले हैं। उनकी जगह स्टील व फाइबर के आधुनिक बटन लगाए जाएंगे, जिन पर गर्व से अशोक चक्र अंकित होगा। यह बदलाव प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ “भारतीय गौरव” को सामने लाने की कोशिश माना जा रहा है।
‘गार्ड’ नहीं, अब होंगे ट्रेन मैनेजर
रेलवे में कई पुराने ब्रिटिशकालीन पदनाम भी बदले जा रहे हैं। अब “गार्ड” को “ट्रेन मैनेजर” कहा जाएगा। वहीं “खलासी” को भी नई तकनीकी पहचान दी जाएगी। रेलवे का कहना है कि यह बदलाव कर्मचारियों की भूमिका को आधुनिक और सम्मानजनक स्वरूप देने के लिए किया जा रहा है।
मील के पत्थर भी बदलेंगे
रेलवे ट्रैक के किनारे लगे पुराने मील के पत्थर अब “किलोमीटर पोस्ट” में बदले जाएंगे। वहीं पुरानी पीतल की घंटियां और पारंपरिक संकेत व्यवस्था की जगह डिजिटल सूचना प्रणाली लाई जा रही है।
‘चलते-फिरते महलों’ का भी बदलेगा रूप
रेलवे के मशहूर “सैलून कोच”, जिन्हें कभी अंग्रेज अधिकारियों के चलते-फिरते महल कहा जाता था, अब हाईटेक बनाए जाएंगे। इनमें सेंसर तकनीक, डेटा रिकॉर्डिंग मशीनें और आधुनिक सुरक्षा सिस्टम लगाए जाएंगे। साथ ही चांदी और चीनी मिट्टी के बर्तनों की जगह स्टेनलेस स्टील और बायोडिग्रेडेबल कटलरी का इस्तेमाल होगा।
‘योर ओबेडिएंट सर्वेंट’ अब इतिहास
रेलवे के आधिकारिक पत्राचार में इस्तेमाल होने वाले ब्रिटिश दौर के शब्द भी हटाए जा रहे हैं। अब “Your Obedient Servant” जैसे शब्दों की जगह “भवदीय” और भारतीय शैली के सम्मानजनक शब्द प्रयोग किए जाएंगे।
‘विकसित भारत’ की ओर रेलवे का बड़ा कदम
आपको बता दें कि रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ दिखावे का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय मानसिकता और प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव का हिस्सा है। रेलवे अब डिजिटल, आधुनिक, स्वदेशी और भारतीय पहचान से जुड़ी व्यवस्था की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल है। अब यह सिर्फ सफर का माध्यम नहीं, बल्कि “औपनिवेशिक सोच से आत्मनिर्भर भारत” की यात्रा का प्रतीक भी बनता दिखाई दे रहा है। स्टेशन वही रहेंगे, पटरी वही रहेगी, लेकिन भारतीय रेलवे की पहचान अब पूरी तरह नए भारत के रंग में दिखाई देने वाली है।