नई दिल्ली: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण कानून को लेकर केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी निजी स्थान पर भी किसी व्यक्ति के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी की जाती है और वहां कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद होकर उस घटना को देख या सुन सकता है, तो उसे भी कानून की नजर में 'पब्लिक व्यू' (Public View) माना जाएगा। ऐसे मामलों में SC/ST एक्ट की संबंधित धाराएं लागू होंगी।
क्या कहा हाईकोर्ट ने?
आपको बता दें कि केरल हाईकोर्ट ने कहा कि किसी घटना के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह किसी सार्वजनिक स्थान (Public Place) पर ही हुई हो। महत्वपूर्ण यह है कि क्या उस घटना के समय वहां ऐसे लोग मौजूद थे, जो अपमानजनक टिप्पणी को सुन या देख सकते थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'पब्लिक प्लेस' और 'पब्लिक व्यू' दोनों अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। यदि किसी निजी घर, परिसर या अन्य निजी स्थान पर भी तीसरे पक्ष की मौजूदगी में जातिसूचक अपमान किया जाता है, तो उसे कानून के तहत 'पब्लिक व्यू' माना जाएगा।
मामला क्या था?
गौरतलब है कि यह मामला एक मंदिर उत्सव के दौरान हुई घटना से जुड़ा था। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित था। आरोप है कि आरोपी ने उसके साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, सार्वजनिक रूप से अपमानित किया, रास्ता रोका और मारपीट की। घटना में शिकायतकर्ता को गंभीर चोटें आईं, जिनमें फ्रैक्चर भी शामिल था। इसी मामले में आरोपी ने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
आरोपी ने कोर्ट में क्या दलील दी?
अग्रिम जमानत की मांग करते हुए आरोपी ने कहा कि उसे शिकायतकर्ता की जाति की जानकारी नहीं थी। उसने यह भी तर्क दिया कि कथित घटना किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं हुई, इसलिए SC/ST एक्ट की धाराएं लागू नहीं होतीं और उसे अग्रिम जमानत मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने क्यों खारिज की दलील?
विदित है कि हाईकोर्ट ने आरोपी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि घटना के समय वहां अन्य लोग मौजूद थे, जिन्होंने जातिसूचक गाली-गलौज और पूरी घटना को देखा और सुना। ऐसे में यह मामला 'पब्लिक व्यू' की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ित को सार्वजनिक अपमान से सुरक्षा देना है। यदि किसी निजी स्थान पर भी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी में ऐसा अपमान किया जाता है, तो उसे सार्वजनिक अपमान माना जाएगा।
गवाहों की मौजूदगी बनी अहम आधार
मामले में तीन प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने आरोपी द्वारा किए गए जातिसूचक अपमान और गाली-गलौज को सुना था। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य मानते हुए कहा कि इसी कारण यह घटना 'पब्लिक व्यू' की परिभाषा में आती है।
आसान भाषा में समझिए फैसला
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने अपने घर, दुकान, खेत या किसी अन्य निजी जगह पर किसी दलित या आदिवासी व्यक्ति के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी की। यदि वहां कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद था, जिसने उस टिप्पणी को देखा या सुना, तो केवल इसलिए आरोपी कानून से नहीं बच सकता कि घटना निजी स्थान पर हुई थी। ऐसे मामले में भी SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
फैसले का क्या असर होगा?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला स्पष्ट करता है कि SC/ST एक्ट में 'पब्लिक व्यू' का अर्थ केवल सार्वजनिक स्थान नहीं है। यदि किसी निजी स्थान पर भी अन्य लोगों की मौजूदगी में जातिसूचक अपमान किया जाता है, तो आरोपी के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई संभव होगी। इससे भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में 'पब्लिक व्यू' की व्याख्या और अधिक स्पष्ट होगी तथा पीड़ितों को कानूनी संरक्षण मिलने में मदद मिलेगी।