लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अब मामला गरमा गया है। पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनाव नहीं होने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य सरकार से जवाब और रिकॉर्ड मांगा है। कोर्ट ने कहा कि निर्धारित कानूनी व्यवस्था के तहत सरकार को छह महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने होंगे। यह समयसीमा नवंबर 2026 में खत्म हो रही है। अदालत की सख्ती के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपी में पंचायत चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव से पहले होंगे या फिर दोनों चुनावों की टाइमिंग आपस में टकराएगी?
चुनाव में देरी पर सरकार ने क्या कहा?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरकार ने हाईकोर्ट में चुनाव टलने के पीछे मुख्य रूप से प्रशासनिक कारण बताए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग की अंतिम मतदाता सूची 10 जून 2026 को प्रकाशित हुई। इसके अलावा पंचायतों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट भी जरूरी है। सरकार का कहना है कि इन प्रक्रियाओं के चलते चुनाव समय पर कराना संभव नहीं हो सका। वहीं, अदालत यह जांचना चाहती है कि चुनाव में देरी वास्तव में सरकार के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुई या फिर चुनाव कराने की जिम्मेदारी समय पर पूरी नहीं की गई।
ग्राम प्रधान से जिला पंचायत तक कार्यकाल खत्म
यूपी में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई, जिला पंचायतों का 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई 2026 को समाप्त हो चुका है। चुनाव नहीं होने के कारण सरकार ने फिलहाल छह महीने के लिए प्रशासकों की व्यवस्था की है। याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पंचायतों का निर्वाचित कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रशासकों के जरिए व्यवस्था चलाना संविधान की भावना से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है।
नवंबर की समयसीमा क्यों महत्वपूर्ण?
गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 243-E में पंचायतों के पांच साल के कार्यकाल और समय पर चुनाव से संबंधित प्रावधान हैं। उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम में भी निर्धारित समय पर चुनाव न होने की स्थिति में छह महीने की व्यवस्था का उल्लेख है। इसी वजह से नवंबर 2026 अब पूरे मामले में बेहद अहम हो गया है। हाईकोर्ट ने संकेत दिया है कि विशेष परिस्थितियों का हवाला देकर चुनाव को अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता।
आरक्षण आयोग ने बढ़ाई मुश्किल
पंचायत चुनाव की राह में सबसे बड़ा पेंच पिछड़ा वर्ग आरक्षण की प्रक्रिया है। आयोग को प्रदेश के जिलों से आंकड़े जुटाकर उनका अध्ययन करना है। आयोग की ओर से प्रक्रिया में समय लगने की बात सामने आई है। यदि आरक्षण की प्रक्रिया नवंबर के बाद तक जाती है तो सरकार के सामने अदालत की समयसीमा और चुनावी तैयारियों के बीच बड़ा कानूनी पेच खड़ा हो सकता है।
विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होंगे?
विदित है कि यही सबसे बड़ा सवाल है। 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव की टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा भी है कि विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होने पर गांवों में स्थानीय गुटबाजी और राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, चुनाव टालने की राजनीतिक वजह सरकार ने आधिकारिक तौर पर नहीं बताई है।
लखनऊ खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त 2026 को तय की है। अब सरकार के रिकॉर्ड और दलीलों पर अदालत का रुख अहम होगा। फिलहाल इतना साफ है कि नवंबर 2026 पंचायत चुनाव को लेकर निर्णायक समयसीमा बन चुका है। अब नजर इस बात पर है कि हाईकोर्ट सरकार को चुनाव कराने के लिए क्या दिशा देता है और आरक्षण की प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी होती है।