लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि वह अपने चुनावी संकल्प पत्र में OBC एक्ट लाने का वादा शामिल कर सकती है। पार्टी के OBC विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल जय हिंद ने इस मुद्दे को लेकर सार्वजनिक रूप से अभियान चलाने की बात कही है। सितंबर 2026 में कांग्रेस ने OBC से जुड़े मुद्दों पर 100 दिन के अभियान की भी घोषणा की है।
OBC एक्ट की मांग क्यों उठ रही है?
आपको बता दें कि कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के खिलाफ होने वाले कथित अत्याचारों से निपटने के लिए विशेष कानूनी संरक्षण की जरूरत है। पार्टी इस प्रस्तावित कानून की तुलना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से कर रही है। हालांकि अभी कोई OBC एक्ट का तैयार कानून या उसका अंतिम मसौदा सामने नहीं आया है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित कानून में किन अपराधों को शामिल किया जाएगा, कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी और इसकी कानूनी संरचना कैसी होगी।
यूपी में OBC आबादी को लेकर क्या आंकड़े हैं?
गौरतलब है कि OBC राजनीति की अहमियत समझने के लिए यूपी की सामाजिक संरचना भी महत्वपूर्ण है। 2001 में गठित हुकुम सिंह समिति से जुड़े आंकड़ों के आधार पर राज्य में 79 OBC जातियों की आबादी 50 फीसदी से अधिक होने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि जातिवार आबादी का कोई नया आधिकारिक पूर्ण आंकड़ा उपलब्ध नहीं है और ये आंकड़े पुराने अनुमान पर आधारित हैं। इसी अनुमान में यादवों की हिस्सेदारी 19.40 फीसदी, कुर्मी-पटेल की 7.4 फीसदी, लोध की 4.8 फीसदी तथा निषाद-मल्लाह-केवट की 4.3 फीसदी बताई गई थी। इन आंकड़ों को वर्तमान जनसंख्या का सटीक प्रतिनिधित्व मानने में सावधानी जरूरी है।
सपा के लिए भी अहम होगा मुद्दा
विदित है कि कांग्रेस के इस प्रस्ताव के बीच समाजवादी पार्टी के रुख पर भी चर्चा शुरू हो गई है। सपा लंबे समय से पिछड़े वर्गों और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को अपनी राजनीति का प्रमुख हिस्सा बताती रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी 2027 के चुनाव से पहले गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समूहों के बीच भी अपना आधार बढ़ाने पर जोर दे रही है। लेकिन कांग्रेस के प्रस्तावित OBC एक्ट पर सपा का अंतिम रुख क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। किसी संभावित गठबंधन में इस मुद्दे पर दोनों दलों की भूमिका चुनावी रणनीति और कानून के वास्तविक मसौदे पर निर्भर करेगी।
SC-ST एक्ट से कितनी होगी समानता?
गौरतलब है कि SC-ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार रोकना है। इसमें विशेष अपराधों के लिए प्रावधान, विशेष अदालतों तथा पीड़ितों को राहत और पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएं हैं। इस कानून में 2015 और 2018 में महत्वपूर्ण संशोधन भी किए गए। कांग्रेस के प्रस्तावित OBC कानून में इन प्रावधानों में से क्या शामिल होगा, यह अभी सामने नहीं आया है।
असली चुनौती कानून को जमीन पर लागू करने की
OBC एक्ट की घोषणा राजनीतिक स्तर पर की जा सकती है, लेकिन कानून बनाने के बाद उसकी परिभाषा, अपराधों की सूची, जांच प्रक्रिया, अदालतों की व्यवस्था और दूसरे समुदायों के साथ होने वाले विवादों में कानून के इस्तेमाल जैसे सवालों का जवाब देना होगा। यही वजह है कि आने वाले समय में कांग्रेस को केवल कानून का वादा ही नहीं, बल्कि उसका पूरा कानूनी ढांचा और क्रियान्वयन मॉडल भी स्पष्ट करना पड़ सकता है।
2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले OBC एक्ट का मुद्दा अब सियासी बहस में जगह बना चुका है। कांग्रेस इसे अपने सामाजिक न्याय एजेंडे का हिस्सा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जबकि प्रस्तावित कानून का वास्तविक स्वरूप और अन्य दलों की प्रतिक्रिया आने वाले महीनों में तस्वीर साफ करेगी।