यूपी में रेंट एग्रीमेंट के नियमों में बड़ा बदलाव!: पहले से कई गुना सस्ता, अब ₹10,000 की जगह मात्र...जानें कितनी हुई नई रजिस्ट्रेशन दरें और किसे मिलेगा इसका लाभ_एक नज़र
यूपी में रेंट एग्रीमेंट के नियमों में बड़ा बदलाव!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में किराए के मकान, दुकान या अन्य संपत्ति में रहने वालों और संपत्ति मालिकों के लिए बड़ी राहत की खबर है। राज्य सरकार ने रेंट एग्रीमेंट यानी किरायेदारी अनुबंध को रजिस्टर्ड कराने की प्रक्रिया को पहले के मुकाबले काफी सस्ता कर दिया है। नए शुल्क ढांचे से लंबी अवधि के किरायेदारी समझौते पर लगने वाला खर्च भी काफी कम हो जाएगा। सरकार का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा किरायेदारी अनुबंधों को कानूनी रूप से दर्ज कराना और मकान मालिक-किरायेदार के बीच होने वाले विवादों को कम करना है।

एक साल के एग्रीमेंट पर अब 2 हजार रुपये

आपको बता दें कि नए प्रावधान के तहत अगर किसी संपत्ति का औसत वार्षिक किराया 2 लाख रुपये तक है और एग्रीमेंट एक साल तक के लिए किया जा रहा है, तो उसके पंजीकरण पर कुल 2,000 रुपये खर्च होंगे। इसमें 1,000 रुपये स्टांप शुल्क और 1,000 रुपये रजिस्ट्रेशन फीस शामिल है। पहले इसी श्रेणी के एक साल के किराया अनुबंध पर करीब 10 हजार रुपये तक खर्च आता था। यानी अब ऐसे मामलों में किरायेदार और मकान मालिक दोनों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी घट गया है।

10 साल के एग्रीमेंट पर भी बड़ी राहत

गौरतलब है कि सरकार ने लंबी अवधि के किरायेदारी अनुबंधों के लिए भी शुल्क कम किया है। 6 लाख से 10 लाख रुपये तक के औसत वार्षिक किराये वाले 5 से 10 साल तक के अनुबंध पर अब कुल शुल्क 26 हजार रुपये होगा। इसी तरह 2 लाख रुपये तक के औसत वार्षिक किराये पर 5 से 10 साल के अनुबंध के लिए कुल शुल्क 8 हजार रुपये रखा गया है। 2 से 6 लाख रुपये के वार्षिक किराये की श्रेणी में इसी अवधि के लिए कुल शुल्क 16 हजार रुपये होगा।

10 लाख रुपये तक के किराये पर राहत

सरकार की नई व्यवस्था का लाभ मुख्य रूप से 10 लाख रुपये तक के औसत वार्षिक किराये वाले किरायेदारी अनुबंधों को मिलेगा। इससे ज्यादा किराये वाले मामलों में निर्धारित सीमा तक रियायत का प्रावधान रहेगा और अतिरिक्त राशि पर मौजूदा व्यवस्था के अनुसार शुल्क लिया जाएगा। टोल टैक्स और खनन से जुड़े पट्टों को इस रियायत से बाहर रखा गया है।

क्यों लिया गया फैसला?

विदित है कि दरअसल, अधिक स्टांप शुल्क और रजिस्ट्रेशन खर्च के कारण बहुत से लोग किरायेदारी समझौते को औपचारिक रूप से रजिस्टर्ड कराने से बचते रहे हैं। इससे भविष्य में किराया, मकान खाली कराने, संपत्ति के इस्तेमाल या अन्य शर्तों को लेकर विवाद पैदा होने पर दोनों पक्षों के सामने कानूनी परेशानी खड़ी हो सकती है। सरकार का मानना है कि शुल्क कम होने से लोग रेंट एग्रीमेंट को रजिस्टर्ड कराने के लिए ज्यादा प्रेरित होंगे। इससे किरायेदारी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ सकती है और विवाद की स्थिति में लिखित एवं पंजीकृत दस्तावेज महत्वपूर्ण सबूत के रूप में काम आ सकता है।

अब 100 रुपये के स्टांप पर ही निर्भरता नहीं

अक्सर एक साल से कम अवधि की किरायेदारी में लोग साधारण स्टांप पेपर पर समझौता कर लेते हैं। हालांकि, लंबी अवधि की किरायेदारी में पंजीकरण की कानूनी जरूरत महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार की नई कम-फीस व्यवस्था का मकसद इसी औपचारिक प्रक्रिया को ज्यादा आसान और सस्ता बनाना है।

सरकार ने शुल्क ढांचा किया आसान

नई व्यवस्था में अवधि और औसत वार्षिक किराये के आधार पर निश्चित शुल्क तय किया गया है। इससे लोगों को पहले की तरह बड़ी रकम की गणना कराने की परेशानी कम होगी। उदाहरण के तौर पर:

  • 2 लाख तक वार्षिक किराया: 1 साल तक 2,000 रुपये

  • 2 से 6 लाख: 1 साल तक 6,000 रुपये

  • 6 से 10 लाख: 1 साल तक 9,000 रुपये

  • 5 से 10 साल और 6 से 10 लाख वार्षिक किराया: 26,000 रुपये

इस तरह सरकार ने किरायेदारी के कागजात को रजिस्टर्ड कराने का रास्ता पहले से अधिक किफायती बनाने की कोशिश की है।

मकान मालिक और किरायेदार दोनों को फायदा

नई व्यवस्था का सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो घर, फ्लैट, दुकान या अन्य संपत्ति किराये पर देते या लेते हैं। कम शुल्क में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट होने से दोनों पक्षों के अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से दस्तावेज में दर्ज की जा सकेंगी।

सरकार की यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश में किरायेदारी को ज्यादा व्यवस्थित और औपचारिक बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। अब कम खर्च में पंजीकृत अनुबंध की सुविधा मिलने से उम्मीद है कि ज्यादा मकान मालिक और किरायेदार लिखित एवं कानूनी दस्तावेज के साथ किरायेदारी करना पसंद करेंगे।

अन्य खबरे