जयपुर : राजस्थान की राजनीति और पंचायत व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने की तैयारी है। राज्य सरकार ने विधानसभा में साफ संकेत दे दिए हैं कि आने वाले समय में दो से ज्यादा बच्चों वाले लोग भी पंचायत और निकाय चुनाव लड़ सकेंगे, और उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं बनाई जाएगी। यानी अब पढ़ाई-लिखाई या परिवार के आकार के आधार पर चुनाव लड़ने से रोक लगाने की नीति ढीली पड़ सकती है।
क्या बदलेगा; सरल भाषा में समझिए :
आपको बता दें कि सरकार ने लिखित जवाब में दो अहम बातें स्पष्ट कीं:
अनपढ़ उम्मीदवारों पर चुनाव लड़ने की रोक नहीं लगेगी
दो से ज्यादा संतान वाले लोगों पर लगी पाबंदी हटाने की प्रक्रिया चल रही है
इसका मतलब है कि गांव की राजनीति में फिर वही पुराना नियम लौट सकता है: जो जनता चाहे, वही नेता बने।
कैसे आया यह मुद्दा?
गौरतलब है कि विधानसभा में विधायक ने पूछा कि क्या सरकार उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम पढ़ाई तय करेगी और दो-बच्चे नियम को जारी रखेगी। इस दौरान सरकार का जवाब चौंकाने वाला था उन्होंने बताया कि शिक्षा अनिवार्यता लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है और दो-बच्चे नियम हटाने की फाइल विधि विभाग में विचाराधीन है, यानी बदलाव लगभग तय माना जा रहा है।
30 साल पुराना नियम क्या था?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1994-95 में बनाया गया कानून कहता था कि 2 से ज्यादा बच्चे वाले चुनाव नहीं लड़ सकते। चुनाव जीतने के बाद तीसरा बच्चा पद छिन सकता था। साथ ही गलत जानकारी देने पर जेल तक हो सकती थी। उस समय इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना और जिम्मेदार नेतृत्व चुनना था।
अब क्यों हट सकता है नियम?
गौरतलब है कि समय के साथ राजनीतिक और सामाजिक तर्क बदल गए हैं। लोकतंत्र में पढ़ाई नहीं, जनता का भरोसा मायने रखता है, ग्रामीण समाज में कई प्रभावशाली लोग पढ़े-लिखे नहीं है और परिवार नियोजन को निजी मामला माना जा रहा है। इसलिए सरकार का संकेत साफ है कि प्रतिनिधि चुनने का अधिकार पूरी तरह जनता को दिया जाएगा।
क्या असर पड़ेगा?
इसका बड़ा असर गांव की राजनीति पर पड़ेगा। ज्यादा उम्मीदवार मैदान में उतरेंगे। पुराने अनुभवी चेहरे फिर सक्रिय होंगे। वहीं सामाजिक असर में गरीब और कम पढ़े लोगों की भागीदारी बढ़ेगा। शिक्षा बनाम जनाधार की बहस तेज होगी। वहीं राजनीतिक असर में पंचायत चुनाव ज्यादा प्रतिस्पर्धी होंगे। जाति-समुदाय आधारित समीकरण मजबूत होंगे
कर्मचारियों को पहले मिल चुकी थी राहत :
गौरतलब है कि पहले सरकारी नौकरी में भी तीसरे बच्चे पर प्रमोशन रुकता था लेकिन बाद में नियम ढीले किए गए। अब वही सोच चुनावी व्यवस्था में भी दिख रही है।
सब मिलाकर राजस्थान में पंचायत राजनीति का चेहरा बदलने वाला है। अब नेता बनने की राह डिग्री नहीं, जनता की पसंद तय करेगी। यह फैसला आने वाले पंचायत चुनावों को ज्यादा खुला, ज्यादा प्रतिस्पर्धी और ज्यादा राजनीतिक बना सकता है।