ग्रेटर नोएडा के इस गांव में रावण को जलाने की जगह बेटा मानकर करतें हैं पूजा!: यहाँ न तो पुतला जलाते, और न ही होती हैं रामलीला; सदियों पुरानी इस अनोखी परम्परा की कहानी जान चौंक जाएंगे आप
ग्रेटर नोएडा के इस गांव में रावण को जलाने की जगह बेटा मानकर करतें हैं पूजा!

बिसरख (ग्रेटर नोएडा): देशभर में दशहरा आते ही रावण के पुतले जलाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। जगह-जगह रामलीला का मंचन होता है और विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास बसा एक गांव ऐसा भी है, जहां दशहरे की तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही रामलीला की परंपरा निभाई जाती है। इसकी वजह है रावण से जुड़ी एक स्थानीय मान्यता, जिसके अनुसार वह इसी गांव का बेटा था। इस गांव का नाम बिसरख है। यहां के लोगों के लिए रावण केवल रामायण का वह पात्र नहीं है, जिसका दशहरे पर दहन किया जाता है। ग्रामीण उसे भगवान शिव का अनन्य भक्त और अपने गांव की धार्मिक पहचान से जुड़ा व्यक्तित्व मानते हैं। यही कारण है कि यहां विजयादशमी पर रावण दहन के बजाय शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई जाती है।

रावण के पिता के नाम से जुड़ा है गांव का इतिहास

स्थानीय मान्यता के अनुसार, बिसरख का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रव के नाम पर पड़ा। कहा जाता है कि ऋषि विश्रव यहां तप और पूजा-अर्चना किया करते थे। ग्रामीणों की धार्मिक परंपरा यह भी मानती है कि रावण का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ और उसने यहां शिक्षा प्राप्त की थी। गांव में स्थित प्राचीन शिव मंदिर इस मान्यता का प्रमुख केंद्र है। मंदिर के पुजारी विनय भारद्वाज के मुताबिक, यहां मौजूद अष्टभुजी शिवलिंग को रावण के दादा पुलस्त्य ऋषि से जुड़ी परंपरा के साथ देखा जाता है। मंदिर परिसर में बने चित्रों में रावण को शिव की आराधना करते और अपने सिर अर्पित करते हुए दिखाया गया है। ग्रामीणों का दावा है कि गांव में अलग-अलग स्थानों पर कई शिवलिंग मिले हैं। वर्ष 1984 में तांत्रिक चंद्रास्वामी द्वारा एक शिवलिंग की खुदाई कराए जाने की कहानी भी स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित है। करीब 20 फीट तक खुदाई के बाद भी उसका अंतिम सिरा नहीं मिलने और गुफा व विशेष शंख मिलने के दावे किए जाते हैं।

रामलीला के बाद हुई घटनाओं से जुड़ी मान्यता

आपको बता दें कि बिसरख में रामलीला नहीं कराने के पीछे भी एक पुरानी कहानी सुनाई जाती है। मंदिर के महंत रामदास के अनुसार, करीब छह दशक पहले गांव में रामलीला का आयोजन हुआ था। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके बाद एक व्यक्ति के बेटे की मौत हो गई। कुछ साल बाद दोबारा रामलीला कराए जाने पर एक पात्र की मौत और कई जगह आग लगने की घटनाओं का दावा भी किया जाता है। इन घटनाओं के बाद गांव में रामलीला और रावण दहन बंद कर दिए जाने की बात कही जाती है। हालांकि, मौतों और आग की घटनाओं का रामलीला से कोई संबंध था, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यह प्रसंग मुख्य रूप से स्थानीय मान्यता और ग्रामीणों की सुनाई कहानी के रूप में सामने आता है।

दशहरे पर दहन नहीं, पूजा और प्रार्थना

गौरतलब है कि बिसरख में दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने के बजाय शस्त्र पूजन किया जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता में रावण को शिवभक्त के रूप में सम्मान दिया जाता है। कुछ परंपराओं में उसकी आत्मा की मुक्ति के लिए प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाने का भी उल्लेख मिलता है।

देश के अधिकांश हिस्सों में जहां रावण दहन विजयादशमी का सबसे प्रमुख दृश्य होता है, वहीं बिसरख की परंपरा इस त्योहार को देखने का एक अलग नजरिया पेश करती है। यहां रावण को लेकर लोगों की आस्था उनके स्थानीय इतिहास और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी है। यही वजह है कि दशहरे पर यह गांव बाकी इलाकों से अलग पहचान बनाता है।

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