देहरादून : उत्तराखंड में लाखों अभिभावकों के लिए बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अब स्कूल बस और वैन के किराए को लेकर चल रही मनमानी पर आखिरकार ब्रेक लग गया है। राज्य सरकार ने पहली बार दूरी (किलोमीटर) के आधार पर फिक्स किराया लागू कर दिया है, जिससे पूरे सिस्टम में पारदर्शिता आने वाली है। इससे पेरेंट्स को बहुत राहत होने वाली है।
अब मनमर्जी नहीं चलेगी! सरकार ने कसा शिकंजा
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि राज्य परिवहन प्राधिकरण के इस बड़े फैसले के बाद स्कूल और वाहन संचालक अब अपनी मर्जी से फीस नहीं बढ़ा सकेंगे। इससे उनकी मनमानी पर रोक लगेगा। तय दर से ज्यादा वसूली करने पर कार्रवाई हो सकती है। इससे पूरे राज्य में एक समान नियम लागू होगा।
पहले क्या होता था?
गौरतलब है कि पहले हर स्कूल अलग किराया तय करता था। अभिभावकों को समझ नहीं आता था सही रेट क्या है सब मनमर्जी करते थे और पेरेंट्स को किराये के मामले में ज्यादा से ज्यादा शोषित करते थे। अब यह खत्म हो गया। इससे माता-पिता को बहुत राहत मिली है।
कितना देना होगा किराया? पूरी रेट लिस्ट देखिए
स्कूल बस (मासिक किराया)
•1–10 किमी: ₹2200
•10–20 किमी: ₹2700
•20–30 किमी: ₹3200
•30 किमी से ज्यादा: ₹3700
स्कूल वैन (मासिक किराया)
•1–5 किमी: ₹2100
•5–10 किमी: ₹2500
•10–20 किमी: ₹3000
•20 किमी से ज्यादा: ₹3500
कैसे तय हुआ किराया?
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरकार ने यह दर यूं ही तय नहीं की इसके लिए सरकार ने ईंधन की कीमत, ड्राइवर-हेल्पर की सैलरी, वाहन मेंटेनेंस और ऑपरेशन कॉस्ट जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर यह फाइनल रेट तैयार किया गया है।
अभिभावकों के लिए क्या बदलेगा?
विदित है कि अभिभावकों को अब साफ-साफ पता होगा कि कितनी दूरी पर कितना किराया लिया जायेगा। इससे उन्हें अनेक फायदे होंगे, जैसे -
•ज्यादा पैसे वसूलने पर रोक
•हर स्कूल में समान सिस्टम
•जेब पर कम बोझ
सबसे बड़ा फायदा यही होगा कि “ट्रांसपोर्ट फीस” के नाम पर होने वाली मनमानी खत्म होगी।
क्यों ऐतिहासिक है ये फैसला?
उत्तराखंड में पहली बार स्कूल ट्रांसपोर्ट के लिए आधिकारिक रेट तय किये गए। यह फैसला सिर्फ राहत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को “रेगुलेट” करने की शुरुआत है। यह भविष्य में अन्य राज्यों के लिए भी मॉडल बन सकता है
अब स्कूल बस का किराया “स्कूल की मर्जी” नहीं, “सरकार के नियम” से तय होगा। अभिभावकों को राहत के साथ सिस्टम में पारदर्शिता आएगी। यही इस फैसले की सबसे बड़ी जीत है।