उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से नेपाल जैसी त्रासदी घटित न हो, को लेकर हाई अलर्ट!: अब सैटेलाइट-ड्रोन से होगी 24x7 निगरानी, खतरे से पहले भुस्खलन समेत इन 5 बदलावों पर रखी जाएगी नजर?
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से नेपाल जैसी त्रासदी घटित न हो, को लेकर हाई अलर्ट!

देहरादून: उत्तराखंड में लगातार बारिश के बीच हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों को लेकर सरकार ने निगरानी व्यवस्था और मजबूत करने का फैसला लिया है। संभावित खतरे से निपटने के लिए अब आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाएगा। संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन और सेंसर आधारित सिस्टम के जरिए लगातार नजर रखने की तैयारी है। सरकार का मकसद साफ है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय खतरे के संकेत पहले ही पकड़ लिए जाएं, ताकि प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

झील में होने वाले छोटे बदलाव पर भी नजर

आपको बता दें कि आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र पहुंचकर बारिश, नदियों के जलस्तर, भूस्खलन, सड़क मार्ग और ग्लेशियर झीलों की स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने संबंधित विभागों को 24 घंटे अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए। निगरानी के दौरान खास तौर पर देखा जाएगा कि झील का जलस्तर कितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसके आकार या फैलाव में कोई बदलाव हो रहा है या नहीं और पानी असामान्य तरीके से जमा तो नहीं हो रहा। इसके साथ ही आसपास के इलाकों में संभावित खतरे का आकलन किया जाएगा। जो क्षेत्र ज्यादा जोखिम वाले पाए जाएंगे, वहां अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत किया जाएगा। खतरे का संकेत मिलते ही स्थानीय लोगों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था भी सक्रिय की जाएगी।

नदी किनारे रहने वालों को पहले ही हटाया जाएगा

गौरतलब है कि नदी के किनारे और संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों को जागरूक करने के साथ खतरा बढ़ने पर उन्हें समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की तैयारी है। जरूरत पड़ने पर पड़ोसी राज्यों को भी अलर्ट किया जाएगा। आपदा की स्थिति में बुजुर्गों, दिव्यांगों, गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार लोगों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत पड़ने पर गर्भवती महिलाओं को चिकित्सा सुविधाओं वाले सुरक्षित स्थानों पर पहले ही पहुंचाया जा सकता है। गंभीर परिस्थितियों में हेलीकॉप्टर की मदद भी ली जा सकती है।

नदियों से लेकर सड़कों तक 5 मोर्चों पर नजर

विदित है कि बारिश के दौरान सरकार का फोकस सिर्फ ग्लेशियर झीलों पर नहीं रहेगा। नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी होगी। डैम या बैराज से पानी छोड़े जाने पर नीचे के क्षेत्रों को पहले से सूचना देने की व्यवस्था मजबूत की जाएगी। भूस्खलन संभावित सड़कों पर जेसीबी, पोकलैंड और अन्य मशीनरी पहले से तैनात रखने के निर्देश हैं, ताकि रास्ता बंद होने पर जल्द यातायात बहाल किया जा सके।

दूरदराज में भी नेटवर्क ठप पर नहीं रूकेगा संचार :

दूरदराज के इलाकों में मोबाइल नेटवर्क ठप होने की स्थिति से निपटने के लिए वैकल्पिक संचार व्यवस्था भी तैयार रखने को कहा गया है। बिजली, पेयजल और संचार सेवाओं की बहाली को प्राथमिकता दी जाएगी। दुर्गम क्षेत्रों में खाद्यान्न, दवाइयां, ईंधन और अन्य जरूरी सामान का पर्याप्त स्टॉक रखने की तैयारी है।

आखिर ग्लेशियर झील फटती कैसे है?

विदित है कि ग्लेशियर के पिघलने और पीछे हटने से कई जगह पानी जमा होने लगता है। ग्लेशियर अपने साथ लाई मिट्टी, पत्थर और मलबे से प्राकृतिक बांध जैसी संरचना बना सकता है। इसके पीछे पानी जमा होकर झील बन जाता है। अगर पानी का दबाव बहुत बढ़ जाए या प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाए, तो झील का पानी अचानक तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। इस घटना को Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है।

बारिश के साथ डेंगू पर भी नजर

सरकार ने बारिश के बाद डेंगू के संभावित खतरे को देखते हुए भी तैयारी के निर्देश दिए हैं। जलभराव वाले स्थानों की पहचान कर पानी निकालने, फॉगिंग और एंटी-लार्वा गतिविधियां चलाने पर जोर दिया गया है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में जांच किट, दवाइयां, बेड और मेडिकल स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा गया है।

यानी उत्तराखंड में अब रणनीति ‘खतरा आने के बाद बचाव’ से बदलकर ‘खतरे से पहले चेतावनी और तैयारी’ पर केंद्रित की जा रही है। सैटेलाइट, ड्रोन और सेंसर से मिलने वाली जानकारी के आधार पर समय रहते अलर्ट जारी करना और जरूरत पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना इस पूरी व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा होगा।

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