पंचायत चुनाव को लेकर योगी सरकार का ऐतिहासिक फैसला!: OBC आरक्षण प्रक्रिया के चलते टले चुनाव, प्रधान अब 6 महीने के लिए बने 'प्रशासक', पर नहीं ले सकेंगे ये 3 बड़े फैसले वही जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुख?
पंचायत चुनाव को लेकर योगी सरकार का ऐतिहासिक फैसला!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति और गांवों की सत्ता से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। योगी सरकार ने प्रदेश के सभी ग्राम प्रधानों को छह महीने तक प्रशासक बनाए रखने का फैसला कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सहमति के बाद पंचायती राज विभाग ने इसका आदेश भी जारी कर दिया है। अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या यूपी में पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनावों के बाद ही होंगे? क्योंकि ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया, आयोग की रिपोर्ट और चुनावी तैयारियों को देखते हुए पंचायत चुनाव फिलहाल दूर नजर आ रहे हैं।

अब प्रधान ही संभालेंगे गांव की कमान

आपको बता दें कि प्रदेश में 57 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में सरकार ने पहली बार एडीओ पंचायत की जगह निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाने का फैसला लिया है। Wednesday से सभी प्रधान “प्रशासक” की भूमिका में काम करेंगे। हालांकि उनके अधिकार सीमित रहेंगे और वे सिर्फ सामान्य व रूटीन कार्य ही कर सकेंगे। कोई भी बड़ा या नीतिगत फैसला लेने के लिए उन्हें जिला प्रशासन की मंजूरी लेनी होगी।

पंचायत चुनाव क्यों टल रहे हैं?

दरअसल सरकार ने हाल ही में पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए “समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग” का गठन किया है। यह आयोग प्रदेशभर में सर्वे करके अपनी रिपोर्ट देगा। सूत्रों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया में करीब छह महीने का समय लग सकता है। इसके बाद आरक्षण सूची जारी होगी और फिर चुनावी प्रक्रिया शुरू होगी। इसी बीच 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी तेज हो जाएंगी। माना जा रहा है कि दिसंबर तक विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो सकती है। ऐसे में पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के बाद कराने की संभावना मजबूत हो गई है।

डीएम करेंगे प्रशासकों को नामित

आपको बता दें कि पंचायती राज विभाग के आदेश के अनुसार जिलाधिकारी ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में नामित करेंगे। ये प्रशासक नई पंचायतों की पहली बैठक होने तक या अधिकतम छह महीने तक पद पर बने रहेंगे।
सरकार ने साफ किया है कि—

  • कोई नया नीति निर्णय नहीं लिया जाएगा

  • सिर्फ जरूरी विकास कार्य और रूटीन काम होंगे

  • विशेष मामलों में डीएम की अनुमति जरूरी होगी

पहली बार हुआ ऐसा फैसला

गौरतलब है कि अब तक पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने पर संबंधित विकास खंड के एडीओ पंचायत को प्रशासक बनाया जाता था। लेकिन इस बार सरकार ने ग्राम प्रधानों को ही यह जिम्मेदारी देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। प्रधान संगठनों ने लंबे समय से इसकी मांग की थी। सरकार के इस फैसले के बाद ग्राम प्रधानों में खुशी का माहौल है।

जुलाई में जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुखों की बारी

विदित है कि सिर्फ ग्राम पंचायत ही नहीं, अब क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों में भी यही व्यवस्था लागू होने की संभावना बढ़ गई है।

  • जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल: 11 जुलाई तक

  • ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल: 19 जुलाई तक

अब चर्चा है कि इनके कार्यकाल खत्म होने के बाद भी प्रशासक बैठाए जाएंगे और संभव है कि मौजूदा अध्यक्षों व प्रमुखों को ही जिम्मेदारी दी जाए।

गांवों के विकास कार्य नहीं होंगे प्रभावित

सरकार का कहना है कि यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि गांवों में विकास कार्य रुकें नहीं। अगर प्रशासक की व्यवस्था न होती तो ग्राम पंचायतों का कामकाज पूरी तरह ठप पड़ सकता था। अब सड़क, सफाई, पेयजल, पेंशन और अन्य जरूरी योजनाओं का काम चलता रहेगा।

OBC आरक्षण बना सबसे बड़ा कारण

आपको बता दें कि पंचायत चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण प्रक्रिया मानी जा रही है। सरकार द्वारा गठित आयोग यह तय करेगा कि किस जिले, ब्लॉक और पंचायत में कितने प्रतिशत आरक्षण होगा। नियम के अनुसार किसी भी ब्लॉक में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता। इस पूरी प्रक्रिया में सर्वे, रिपोर्ट और कानूनी औपचारिकताओं के कारण समय लगना तय माना जा रहा है।

अब गांवों की राजनीति में क्या बदलेगा?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर सरकार ने ग्रामीण स्तर पर बड़ा राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश की है। इस फैसले से हजारों ग्राम प्रधानों की नाराजगी दूर हुई है और पंचायत चुनाव टलने की स्थिति में गांवों की सत्ता भी उन्हीं के हाथ में बनी रहेगी।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पंचायत चुनाव आखिर कब होंगे और क्या सचमुच यूपी की ग्रामीण सत्ता का अगला बड़ा चुनाव विधानसभा चुनावों के बाद ही होगा।

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