नई दिल्ली : देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों के हमलों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐसी टिप्पणी की है, जिसने सरकारों, नगर निकायों और खुले में कुत्तों को खाना खिलाने वालों; तीनों की नींद उड़ा दी है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में संकेत दिया कि डॉग बाइट से किसी बच्चे, बुजुर्ग या नागरिक को चोट या मौत होती है, तो उसकी जवाबदेही सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि कुत्तों को खाना खिलाने वालों पर भी तय की जा सकती है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ ने की, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस N. V. अंजरिया शामिल हैं।
“इतना प्यार है तो घर ले जाइए कुत्तों को” – सुप्रीम कोर्ट की दो टूक :
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि -
“अगर आपको इन जानवरों से इतना प्यार है, तो आप उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? उन्हें सड़कों पर घूमने, लोगों को काटने और डराने के लिए क्यों छोड़ा गया है?”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खुले में कुत्तों को खाना खिलाने का मतलब यह नहीं कि उनकी हरकतों की जिम्मेदारी से बचा जा सके।
डॉग बाइट पर देना होगा भारी मुआवजा?
गौरतलब है कि न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने साफ संकेत दिए कि पिछले 5 वर्षों से नियम लागू न करने के लिए राज्य सरकारों से भारी मुआवजा वसूला जा सकता है साथ ही डॉग फीडर्स और संबंधित संगठनों की भी जवाबदेही तय होगी। उन्होंने कहा कि बच्चों और बुजुर्गों की जान जाने के मामलों में अदालत सख्त रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगी।
“9 साल के बच्चे पर हमला हुआ तो जिम्मेदार कौन?”
आपको बता दें कि जस्टिस संदीप मेहता ने भावुक लेकिन सख्त लहजे में सवाल उठाया कि -
“जब 9 साल के बच्चे पर कुत्ते हमला करते हैं, तब जिम्मेदार कौन होगा? क्या हम सिर्फ कुत्तों के लिए संवेदनाएं दिखाते रहेंगे और इंसानों की सुरक्षा पर आंख मूंद लेंगे?”
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपने पूरे न्यायिक जीवन में इंसानों के लिए इतनी लंबी बहसें कभी नहीं देखीं, जितनी इस मामले में कुत्तों को लेकर हो रही हैं।
रेबीज पर भी कोर्ट की चिंता :
विदित है कि पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि कुत्तों में रेबीज जैसे घातक वायरस होते हैं और कई मामलों में इसका कोई इलाज नहीं। यदि समय रहते नियम लागू किए गए होते, तो हालात इतने भयावह नहीं होते।
मामला क्यों अहम है?
गौरतलब है कि यह सुनवाई एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले में हो रही है, जो राष्ट्रीय राजधानी समेत देश के कई शहरों में डॉग बाइट और रेबीज से बच्चों की मौत पर आई मीडिया रिपोर्ट्स के बाद शुरू किया गया था। कोर्ट पहले ही 7 नवंबर 2025 के आदेश में सार्वजनिक स्थानों और संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दे चुका है।
ABC नियमों पर भी सवाल :
गौरतलब है कि वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम सिर्फ नसबंदी तक सीमित हैं। और इनके लागू होने से भी हमलों के खत्म होने की गारंटी नहीं है। अंडरफंडिंग, क्षमता की कमी और भ्रष्टाचार बड़ी बाधा हैं।
अगली सुनवाई कब?
सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील और जन-सुरक्षा से जुड़े मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को दोपहर 2 बजे तय की है।
यह मामला अब सिर्फ कुत्ते बनाम इंसान नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा, जवाबदेही और संवैधानिक कर्तव्य का बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय हो सकता है कि डॉग बाइट पर कौन जिम्मेदार होगा सरकार, नगर निगम या खुले में खाना खिलाने वाले? ऐसे में निर्णय और उसका क्रियान्वयन देखना दिलचस्प होगा।