नई दिल्ली: इलेक्ट्रिक बसों को चार्ज करने के लिए अब घंटों तक डिपो में खड़ा रखने की जरूरत कम हो सकती है। भविष्य में बस अपने रूट पर यात्रियों को उतारने-चढ़ाने के लिए रुकेगी और उसी दौरान उसकी बैटरी भी चार्ज हो सकेगी। खास बात यह है कि इसके लिए किसी चार्जिंग केबल को जोड़ने की जरूरत नहीं होगी। स्विट्जरलैंड की तकनीक कंपनी Winduction एक ऐसी वायरलेस चार्जिंग तकनीक विकसित कर रही है, जिसमें सड़क के अंदर लगी विशेष प्लेट और बस के खास टायरों की मदद से बैटरी तक बिजली पहुंचाई जाएगी। अगर यह तकनीक सफल रहती है, तो इलेक्ट्रिक बसों की बैटरी, चार्जिंग व्यवस्था और संचालन के खर्च में बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, फिलहाल यह तकनीक परीक्षण और प्रोटोटाइप के चरण में है।
सड़क की प्लेट से पहियों के जरिए चार्ज होगी बैटरी
आपको बता दें कि इस तकनीक में बस स्टॉप की सड़क के नीचे एक विशेष चार्जिंग प्लेट लगाई जाएगी। इसके अंदर कॉइल होंगी, जो बिजली मिलने पर चुंबकीय क्षेत्र पैदा करेंगी। बस के विशेष टायरों में भी कॉइल लगाई जाएंगी। जब बस स्टॉप पर रुकेगी और उसका पहिया चार्जिंग प्लेट के ऊपर आएगा, तब चुंबकीय ऊर्जा के जरिए बिजली टायर की कॉइल तक पहुंचेगी। इसके बाद बिजली बस की बैटरी में पहुंचाई जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में बस को किसी तार या चार्जिंग केबल से जोड़ने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि, यह व्यवस्था चलती बस को लगातार चार्ज करने के लिए नहीं है। इसमें चार्जिंग तभी होगी, जब बस निर्धारित स्थान पर रुकेगी और उसका पहिया सड़क में लगी प्लेट के ऊपर आएगा।
छोटी बैटरी से भी चल सकती हैं इलेक्ट्रिक बसें
गौरतलब है कि अभी इलेक्ट्रिक बसों में लंबी दूरी तय करने के लिए बड़ी बैटरी लगानी पड़ती है। इन बैटरियों को चार्ज करने में समय लगता है और इसके लिए डिपो में विशेष चार्जिंग व्यवस्था भी चाहिए। बड़ी बैटरी बस का वजन बढ़ाती है और यात्रियों के लिए उपलब्ध जगह पर भी असर डाल सकती है। नई तकनीक में बस अपने नियमित रूट पर अलग-अलग स्टॉप पर रुकते समय थोड़ी-थोड़ी चार्ज होती रहेगी। इससे कम क्षमता वाली बैटरी के साथ भी बस चलाने की संभावना बढ़ सकती है। यदि ऐसा व्यावहारिक रूप से सफल होता है, तो बसों की खरीद लागत और संचालन खर्च घटाने में मदद मिल सकती है।
24 स्टॉप में सिर्फ दो जगह प्लेट लगाने का अनुमान
विदित है कि कंपनी के एक प्रस्तावित रूट के अनुमान के मुताबिक, ज्यूरिख एयरपोर्ट से ओर्लिकॉन के बीच 24 बस स्टॉप में से केवल दो जगह चार्जिंग प्लेट लगाने की जरूरत पड़ सकती है। कंपनी की गणना के अनुसार, 16 घंटे के संचालन के दौरान बसें इन प्लेटों पर कुल मिलाकर लगभग तीन घंटे चार्ज हो सकती हैं। कंपनी ने अपने प्रोटोटाइप परीक्षण में प्लेट से बैटरी तक बिजली पहुंचाने की क्षमता 90 प्रतिशत से अधिक रहने का दावा किया है। हालांकि, वास्तविक रूट पर लंबे समय तक परीक्षण होने के बाद ही इसकी कार्यक्षमता और खर्च का सही आकलन किया जा सकेगा।
आम बसों में इस्तेमाल से पहले बड़ी चुनौती
इस तकनीक को लागू करने में एक महत्वपूर्ण चुनौती टायरों की बनावट है। सामान्य बसों के टायरों में स्टील की परतें होती हैं, जो चुंबकीय ऊर्जा के साथ प्रतिक्रिया कर सकती हैं। कंपनी के अनुसार, इस समस्या को दूर करने के लिए विशेष स्टील-फ्री टायर विकसित करने पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा चार्जिंग प्लेट, टायर और बैटरी के बीच बिजली के सुरक्षित और भरोसेमंद प्रवाह की जांच भी जरूरी होगी।
2028 में शुरू हो सकता है पहला पायलट
कंपनी की योजना स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख एयरपोर्ट के आसपास 2028 में इस तकनीक का पहला पायलट शुरू करने की है। इससे पहले परीक्षण व्यवस्था तैयार करने और तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों में जांचने की जरूरत होगी।
सड़क से बस के पहियों के जरिए बैटरी चार्ज करने की यह तकनीक इलेक्ट्रिक परिवहन के लिए एक नया विकल्प बन सकती है। लेकिन अभी इसे भविष्य की संभावित सुविधा के रूप में ही देखना चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह तकनीक रोजाना के संचालन में कितनी सुरक्षित, टिकाऊ और किफायती साबित होती है।