पत्नी की प्रताड़ना पर जयपुर कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला!: अदालत ने 32 साल पुराना विवाह किया निरस्त, कोर्ट बोला- परिवार से अलग रहने का दबाव ''मानसिक यातना'', वहीं पैतृक-सम्पत्ति...जानें पूरा मामला
पत्नी की प्रताड़ना पर जयपुर कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला!

जयपुर : जयपुर से एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने वैवाहिक रिश्तों को लेकर बड़ी कानूनी बहस छेड़ दी है। फैमिली कोर्ट ने मानसिक और शारीरिक क्रूरता के आधार पर 32 साल पुरानी शादी को खत्म कर दिया। अदालत ने साफ कहा है कि रिश्ता सिर्फ कागज पर जिंदा हो और जीवन में यातना बन जाए, तो उसे बचाए रखना कानून का उद्देश्य नहीं है।

क्या था पूरा मामला?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सवाई माधोपुर के एक युवक और मुंबई की युवती की शादी वर्ष 1994 में हुई थी। शुरुआत के कुछ समय बाद ही रिश्ते में तनाव शुरू हो गया। पति के मुताबिक पत्नी बार-बार मायके चली जाती थी, हमेशा माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाती थी। साथ ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगती थी। उन पर कई बार मुकदमे दर्ज कराए। सबसे बड़ी बात बच्चों को जहर देने की धमकी तक दी। बताया गया कि लगातार विवादों से परेशान होकर पति ने अपनी पैतृक संपत्ति के दो मकानों की पावर ऑफ अटॉर्नी पत्नी के नाम कर दी। बाद में पत्नी ने एक प्लॉट अपनी बहन को दे दिया।

अलगाव इतना बढ़ा कि रिश्ता खत्म हो गया :

गौरतलब है कि दोनों पति-पत्नी पिछले 8 साल से अलग रह रहे थे और इस दौरान उनके बीच दांपत्य संबंध भी नहीं रहे। यही बात कोर्ट के लिए निर्णायक साबित हुई। अदालत ने माना कि रिश्ता वास्तविक रूप से समाप्त हो चुका था।

पत्नी ने क्या कहा?

विदित है कि पत्नी ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसके सास-ससुर से अच्छे संबंध थे। पति की अपने पिता से नहीं बनती थी उसी वजह से परिवार अलग हुआ। लेकिन अदालत ने पाया कि पत्नी अपने दावों के समर्थन में ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी।

कोर्ट की अहम टिप्पणी :

आपको बता दें कि अदालत ने अपने फैसले में बेहद महत्वपूर्ण बात कही। अदालत ने कहा कि - "मानसिक क्रूरता एक घटना से तय नहीं होती, बल्कि लगातार व्यवहार के प्रभाव से तय होती है।" कोर्ट ने माना कि अलग रहने का दबाव, बार-बार मुकदमे, संपत्ति के लिए दबाव और धमकियां इन सबका संयुक्त प्रभाव मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

गौरतलब है कि यह फैसला इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट किया कि पति भी क्रूरता का शिकार हो सकता है, और कानून दोनों पक्षों के लिए समान है। अब अदालतों में यह निर्णय भविष्य के वैवाहिक विवादों में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, खासकर उन मामलों में जहां रिश्ता सिर्फ औपचारिक रूप से बचा हो लेकिन व्यवहारिक रूप से खत्म हो चुका हो।

इस फैसले ने विवाह में मानसिक प्रताड़ना की परिभाषा को व्यापक बनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि लगातार दबाव डालना, धमकी देना, संपत्ति के लिए लालच दिखाना और बेवजह कानूनी कार्रवाई करके पति को परेशान करना भी गंभीर मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। 8 वर्षों से अधिक के अलगाव ने इस रिश्ते के सुधरने की कोई संभावना नहीं छोड़ी थी, जिसे अदालत ने विवाह विच्छेद का वैध आधार माना। यह फैसला उन सभी पीड़ित पतियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है, जो शारीरिक नहीं, बल्कि सूक्ष्म मानसिक प्रताड़ना का शिकार होते हैं।

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