यूपी में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टलने के बढ़े आसार!: आरक्षण का अटका पेंच; जानें आरक्षण का पूरा गणित औऱ क्यों आ रही हैं चुनाव में अड़चन?
यूपी में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव टलने के बढ़े आसार!

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। संकेत मिल रहे हैं कि पंचायत चुनाव तय समय पर होना मुश्किल हो सकता है, और इसकी सबसे बड़ी वजह है; आरक्षण की प्रक्रिया का अधर में लटकना। गांव की सरकार बनाने की यह कवायद अब प्रशासनिक और राजनीतिक उलझनों में फंसती नजर आ रही है।

जानें क्या आ रही अड़चन?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि असल अड़चन समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को लेकर है। अभी तक यह आयोग बना ही नहीं है, जबकि ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए इसकी रिपोर्ट अनिवार्य मानी जाती है। आयोग की रिपोर्ट के बिना पंचायतों में आरक्षण तय नहीं हो सकता और जब तक आरक्षण तय नहीं होगा, चुनाव की अधिसूचना भी जारी नहीं हो पाएगी। पंचायतीराज विभाग ने 6 सदस्यीय आयोग के गठन का प्रस्ताव शासन को भेजा है, लेकिन अब तक उस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

आरक्षण का गणित क्या कहता है?

गौरतलब है कि 2011 जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या में अनुसूचित जाति (SC) की जनसंख्या 20.6982% और अनुसूचित जनजाति (ST) की प्रतिशत 0.5677% है। इन वर्गों के लिए पंचायत चुनाव में उतने ही प्रतिशत सीटें आरक्षित रहेंगी। ओबीसी का पेंच यहीं फंसा है। जनगणना में ओबीसी के अलग आंकड़े नहीं हैं। रैपिड सर्वे 2015 के अनुसार ग्रामीण यूपी में ओबीसी आबादी 53.33% है। लेकिन नियम के मुताबिक किसी भी स्तर पर ओबीसी आरक्षण 27% से ज्यादा नहीं हो सकता। अगर किसी ब्लॉक में ओबीसी आबादी 27% से कम है, तो उसी अनुपात में आरक्षण देना होगा। यानी, राज्य स्तर पर 27% ओबीसी आरक्षण तय करना अनिवार्य है, लेकिन इसके लिए आयोग की रिपोर्ट जरूरी है।

नगर निकाय जैसा दोहराव?

विदित है कि नगर निकाय चुनावों में भी ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद हुआ था। तब सरकार ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाकर सर्वे कराया और रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण तय किया गया। अब पंचायत चुनाव में भी वही मॉडल अपनाया जाएगा। आयोग जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का सर्वे करेगा, फिर रिपोर्ट देगा, तब आरक्षण तय होगा।

मंत्री का दावा; समय पर होंगे चुनाव

आपको बता दें कि पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया है कि पंचायत चुनाव अप्रैल–मई में ही होंगे। आयोग गठन में देरी के सवाल पर उन्होंने कहा कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री से मिलेंगे और आयोग बनने के बाद दो महीने में रिपोर्ट दे दी जाएगी। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि

आयोग कब बनेगा?

सर्वे कब शुरू होगा?

आरक्षण की अधिसूचना कब आएगी?

अगर इन प्रक्रियाओं में देरी हुई, तो चुनाव टलना लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में गांव की सरकार का भविष्य फिलहाल आरक्षण की फाइलों में फंसा हुआ दिख रहा है।

यूपी में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव सिर्फ तारीखों की नहीं, संवैधानिक प्रक्रिया और सामाजिक संतुलन की परीक्षा बन गए हैं। सरकार के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग जमीन पर नहीं उतरता, तब तक पंचायत चुनाव पर अनिश्चितता की छाया बनी रहेगी।

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