सम्पत्ति विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला!: इन परिस्थितियों में राजस्व रिकॉर्ड से नाम हटने पर, नहीं खत्म होता मालिकाना हक? जानें पूरा मामला
सम्पत्ति विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला!

नई दिल्ली: जमीन-जायदाद के विवादों में अक्सर राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाम को ही मालिकाना हक का आधार मान लिया जाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाना अपने आप में संपत्ति का मालिक नहीं बनाता और किसी दूसरे व्यक्ति का नाम चढ़ जाने से पहले से मौजूद मालिकाना हक खत्म भी नहीं होता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने संयुक्त पारिवारिक कृषि भूमि से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी सह-स्वामी का नाम बाद में राजस्व रिकॉर्ड से हटकर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाता है, तो केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपनी संपत्ति में हिस्सा स्वेच्छा से छोड़ दिया था।

दो भाइयों के बीच था संपत्ति का विवाद

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मामला एक पारिवारिक कृषि भूमि से जुड़ा था। यह संपत्ति मूल रूप से भगवानसिंह के नाम थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके दो बेटों रामप्रसाद और वासुदेव को संपत्ति में अधिकार मिला और दोनों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए। बाद में स्थिति बदल गई और रिकॉर्ड में संपत्ति केवल वासुदेव और उनके बेटे के नाम दर्ज हो गई। इसके बाद रामप्रसाद के कानूनी उत्तराधिकारियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दावा किया कि रामप्रसाद का संपत्ति में सह-स्वामित्व बना हुआ था। इसलिए उन्हें उनके हिस्से की घोषणा, बंटवारा और अलग कब्जा दिया जाना चाहिए।

दूसरे पक्ष ने कहा- रामप्रसाद ने छोड़ दिया था हिस्सा

गौरतलब है कि मामले में दूसरे पक्ष की ओर से दावा किया गया कि रामप्रसाद ने खुद अपनी संपत्ति का हिस्सा छोड़ दिया था। इसके समर्थन में हलफनामा, नायब तहसीलदार के सामने दिया गया बयान और एक सहमति पत्र पेश किया गया। लेकिन ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत इन दलीलों से सहमत नहीं हुए। दोनों अदालतों ने रामप्रसाद के उत्तराधिकारियों के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इन निष्कर्षों को पलट दिया। मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए निचली अदालत के निर्णय को बहाल कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदल जाने से किसी व्यक्ति के संपत्ति अधिकार का अंत नहीं हो जाता। यदि यह दावा किया जा रहा है कि किसी सह-स्वामी ने अपना हिस्सा छोड़ दिया था, तो उस दावे को अलग और विश्वसनीय सबूतों से साबित करना होगा। कोर्ट के मुताबिक, जिस मूल लेनदेन या कानूनी कार्रवाई के आधार पर किसी व्यक्ति के मालिकाना अधिकार को खत्म बताया जा रहा है, उसका स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक है।

पंजीकृत त्यागपत्र का भी नहीं था सबूत

विदित है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि प्रतिवादी पक्ष ऐसा कोई पंजीकृत त्यागपत्र या स्वतंत्र गवाह पेश नहीं कर पाया, जिससे यह साबित हो सके कि रामप्रसाद ने वास्तव में अपनी संपत्ति का अधिकार छोड़ दिया था। यानी केवल राजस्व अधिकारी के रिकॉर्ड में बदलाव या किसी दस्तावेज में नाम दर्ज होना पर्याप्त नहीं था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नायब तहसीलदार का आदेश राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि से संबंधित हो सकता है, लेकिन वह अपने आप किसी व्यक्ति का मालिकाना हक दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

राजस्व रिकॉर्ड का मतलब मालिकाना हक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया। राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना मुख्य रूप से राजस्व और प्रशासनिक उद्देश्यों से जुड़ा होता है। इसे अपने आप संपत्ति के अंतिम मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माना जा सकता। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि राजस्व प्रविष्टि की शुद्धता को लेकर जो वैधानिक धारणा है, वह खंडनीय साक्ष्यात्मक धारणा है। इसका अर्थ है कि रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी को सबूत के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसे अंतिम और अटल मालिकाना हक नहीं माना जा सकता।

जमीन-जायदाद के मामलों में क्या है इसका मतलब?

इस फैसले का सीधा असर उन मामलों पर पड़ सकता है जहां परिवार की जमीन या संपत्ति में किसी व्यक्ति का नाम राजस्व रिकॉर्ड से हट जाता है और बाद में दूसरा पक्ष उसी प्रविष्टि को मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण बताने लगता है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि नाम चढ़ना और मालिकाना हक हासिल करना दो अलग बातें हैं। अगर किसी सह-स्वामी ने अपना हिस्सा वास्तव में छोड़ दिया है, तो उस अधिकार-त्याग को कानूनन साबित करना होगा। केवल यह कहना कि रिकॉर्ड में उसका नाम नहीं है, पर्याप्त नहीं होगा।

रामप्रसाद के उत्तराधिकारियों को मिला अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया। इसके साथ ही रामप्रसाद के कानूनी उत्तराधिकारियों के सह-स्वामित्व के अधिकार को मान्यता मिली। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उनके हिस्से का निर्धारण कानून के अनुसार बंटवारे की प्रक्रिया में किया जाए।

इस फैसले की सबसे अहम बात यही है कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलना और संपत्ति का कानूनी मालिकाना हक खत्म होना एक ही बात नहीं है। संपत्ति से किसी व्यक्ति का अधिकार हटाने के लिए सिर्फ रिकॉर्ड की एंट्री नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद वैध कानूनी आधार और ठोस प्रमाण जरूरी होंगे।

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