POSCO के झूठे आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तय की नई गाइडलाइन!: FIR होते ही अब सीधे गिरफ्तारी पर लगाई रोक, कस्टडी विवादों के दुरूपयोग को लेकर कोर्ट ने तय किए ये 3 कड़े नियम?
POSCO के झूठे आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तय की नई गाइडलाइन!

नई दिल्ली: बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाले POCSO एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने वैवाहिक विवाद और बच्चों की कस्टडी की लड़ाई के दौरान कानून के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय तय किए हैं। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया है कि ये व्यवस्था हर POCSO मामले पर लागू नहीं होगा।

तलाकशुदा दम्पत्ति का था मामला

आपको बता दें कि मामला एक तलाकशुदा दंपति के बीच बच्ची की कस्टडी को लेकर चल रहे लंबे विवाद से जुड़ा था। इस दौरान पिता के खिलाफ नाबालिग बेटी के यौन शोषण के आरोप में POCSO के तहत FIR दर्ज हुई। बाद में CBI जांच और विशेषज्ञों के मूल्यांकन में आरोपों के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद FIR को रद्द कर दिया और भविष्य के मामलों के लिए सुरक्षा उपाय तय किए।

FIR दर्ज होते ही अब हर मामले में गिरफ्तारी नहीं

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सिर्फ FIR दर्ज हो जाना अपने आप गिरफ्तारी का आधार नहीं है। खास परिस्थितियों वाले POCSO मामलों में पुलिस को गिरफ्तारी से पहले कानून में निर्धारित शर्तों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करना होगा। ये सुरक्षा उपाय तब लागू होंगे जब आरोप बच्चे के माता-पिता या उसके साथ एक ही घर में रहने वाले परिवार के सदस्य पर हो और बच्चे के माता-पिता के बीच किसी तरह का वैवाहिक विवाद मौजूद हो।

पहला बड़ा नियम: जल्दबाजी में गिरफ्तारी नहीं

विदित है कि ऐसे मामलों में जांच अधिकारी को केवल FIR के आधार पर जल्दबाजी में आरोपी को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए। गिरफ्तारी के लिए कानून के मुताबिक उचित आधार और आवश्यकता का आकलन करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस के पास गिरफ्तारी की कानूनी शक्ति होना और उस शक्ति का इस्तेमाल करना दो अलग बातें हैं।

दूसरा नियम: बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में विशेषज्ञ की मदद

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या क्लिनिकल साइकोलॉजी के विशेषज्ञ की सहायता लेने की व्यवस्था की है। विशेषज्ञ बच्चे से बातचीत कर स्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन करेगा। इसका उद्देश्य बच्चे पर किसी तरह का दबाव, प्रभाव या बार-बार पूछताछ से होने वाली परेशानी को ध्यान में रखते हुए जांच को संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ाना है। विशेषज्ञ की रिपोर्ट जांच अधिकारी के सामने उपलब्ध सामग्री के साथ विचार के लिए रखी जाएगी।

तीसरा नियम: निजी शिकायतों पर भी कोर्ट बरतेगा अतिरिक्त सावधानी

अगर कोई व्यक्ति सीधे POCSO की विशेष अदालत में निजी शिकायत दाखिल करता है, तो अदालत को भी शिकायत और उपलब्ध सामग्री पर अपना न्यायिक विवेक लगाना होगा। ऐसे मामलों में, निर्धारित परिस्थितियों में बच्चे के विशेषज्ञ मूल्यांकन की मदद ली जा सकती है, ताकि बिना पर्याप्त आधार के आगे की कार्रवाई न हो।

कोर्ट ने कहा—POCSO की सख्ती कमजोर नहीं होनी चाहिए

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इन सुरक्षा उपायों का उद्देश्य POCSO एक्ट की कठोरता या बच्चों की सुरक्षा को कमजोर करना नहीं है। अदालत के अनुसार जरूरत एक ऐसे संतुलन की है, जिसमें बच्चे के हित और सुरक्षा सर्वोच्च रहें, लेकिन झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों से किसी निर्दोष व्यक्ति को ऐसी क्षति न पहुंचे जिसकी भरपाई मुश्किल हो। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि माता-पिता के विवाद के बीच बच्चे को खींचना उसके लिए बेहद पीड़ादायक हो सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में जांच और कानूनी प्रक्रिया दोनों को संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाना जरूरी है।

इस फैसले से स्पष्ट है कि POCSO जैसे गंभीर कानून में शिकायत की जांच पूरी गंभीरता से होगी, लेकिन वैवाहिक या कस्टडी विवाद की विशेष परिस्थितियों में गिरफ्तारी और आगे की कार्रवाई से पहले अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा उपाय भी अपनाए जाएंगे।

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