नोएडा/बांदा : उत्तर प्रदेश की जेल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्क्रैप माफिया और कुख्यात गैंगस्टर रवि काना को बिना किसी रिहाई आदेश के बांदा जेल से छोड़ दिया गया, और मामला सामने आते ही प्रशासन में हड़कंप मच गया। 24 घंटे के भीतर जेलर सस्पेंड, कोर्ट सख्त और जवाबदेही तय करने की तैयारी में है।
बिना आदेश कैसे छूटा गैंगस्टर? :
आपकी जानकारी के लिये बता दें कि नोएडा सेक्टर-63 थाने में दर्ज केस में रवि काना पहले से ही बी-वारंट पर तलब था। 29 जनवरी को अदालत में पेशी हुई और उसी शाम 6:39 बजे उसे जेल से रिहा कर दिया गया। हैरानी की बात ये कि रिहाई का कोई आदेश था ही नहीं।
कोर्ट का तीखा सवाल; FIR क्यों न हो?
विदित है कि गौतमबुद्ध नगर सीजेएम कोर्ट ने जेल प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है और कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूछा कि जब आरोपी बी-वारंट पर तलब था, तो किस आधार पर छोड़ा गया? जब रिमांड पर सुनवाई चल रही थी, तब बिना आदेश रिहाई कानूनी अपराध नहीं? आप पर FIR क्यों न दर्ज की जाए? कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि यह गंभीर प्रशासनिक चूक है।
जेलर सस्पेंड, रिपोर्ट तलब :
आपको बता दें कि मामले की गंभीरता देखते हुए बांदा जेल के जेलर विक्रम सिंह यादव को सस्पेंड कर दिया गया। जेल प्रशासन ने माना कि बी-वारंट के बावजूद रिहाई हुई और जिम्मेदारी तय की।
जेल अधीक्षक की दलील :
विदित है कि जेल अधीक्षक का कहना है कि आरोपी के अन्य मामलों में पहले ही रिहाई आदेश मिल चुके थे। कस्टडी वारंट समय पर नहीं मिला। शाम 5 बजे तक कोई निर्देश नहीं आया, इसलिए रूटीन प्रक्रिया में रिहा कर दिया गया। लेकिन कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी।
“आदेश देर से आया”; फिर भी जिम्मेदारी तय :
गौरतलब है कि जेल प्रशासन के मुताबिक कस्टडी वारंट शाम करीब 7:45 बजे मेल पर आया, तब तक आरोपी बाहर जा चुका था। अब 6 फरवरी तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।
कोर्ट के दो सीधे निर्णायक सवाल :
रिहाई के कारण व परिस्थितियां - बी-वारंट की जानकारी के बावजूद कैसे छोड़ा?
रिमांड के दौरान रिहाई - क्या यह कस्टडी से भागने का मामला बनता है? FIR क्यों न हो?
क्या रहा इसका नतीजा?
आपको बता दें कि नतीजा यह रहा कि जेलर सस्पेंड कर दिया गया। और तत्काल गिरफ्तारी के निर्देश दिए गए। इससे पूरी जेल व्यवस्था पर सवाल उठ गया है साथ ही जवाबदेही तय होने के संकेत दिए गए है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या सिस्टम की गहरी खामी? बी-वारंट के बावजूद रिहाई, यह गलती नहीं, खतरे की घंटी है। अब निगाहें कोर्ट की अगली कार्रवाई और रिपोर्ट के निष्कर्ष पर टिकी हैं।