यूपी पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट में सरकार का बड़ा बयान!: OBC आयोग बनने के बाद ही पड़ेगा वोट, आरक्षण के सर्वे रिपोर्ट...जानें कब तक टल सकता चुनाव और देरी की प्रमुख वजह?
यूपी पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट में सरकार का बड़ा बयान!

लखनऊ : उत्तर प्रदेश की सियासत में बड़ा मोड़ आने जा रहा है। गांव-गांव की सत्ता तय करने वाले पंचायत चुनाव अब तय समय पर होते नहीं दिख रहे। वजह आरक्षण का नया गणित है। योगी सरकार ने हाईकोर्ट में साफ कह दिया है कि पहले समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनेगा, वह पूरे प्रदेश में सर्वे करेगा और उसी रिपोर्ट के आधार पर सीटों का आरक्षण तय होगा। यानी चुनाव से पहले जातीय आंकड़ों की नई किताब लिखी जाएगी और तब तक वोटिंग रुकी रहेगी।

क्या कहा सरकार ने कोर्ट में?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लखनऊ हाईकोर्ट में दायर हलफनामे में सरकार ने बताया कि नया OBC आयोग बनाया जाएगा। आयोग प्रदेशभर में रैपिड सर्वे करेगा। रिपोर्ट आने के बाद ही पंचायत सीटों का आरक्षण तय होगा। इस प्रक्रिया में कम से कम 2 महीने या उससे ज्यादा समय लग सकता है। उसके बाद ही चुनाव हो सकेगा। यानी अप्रैल-मई में चुनाव की संभावना लगभग खत्म मानी जा रही है।

आखिर अचानक आयोग की जरूरत क्यों पड़ी?

गौरतलब है कि मामला पुराने पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों पर सवाल से शुरू हुआ। पुराने आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में खत्म हो चुका था। उसे 2026 तक बढ़ाया गया। लेकिन कानूनी रूप से उसे नया सर्वे कराने का अधिकार नहीं माना गया। कोर्ट में दलील दी गई कि बिना वैध आयोग के आरक्षण तय करना नियमों के खिलाफ होगा। इसलिए अब नया आयोग बनेगा और वही असली डेटा देगा।

क्यों जरूरी है यह सर्वे?

विदित है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन साफ कहती है किसी भी पंचायत/निकाय चुनाव से पहले वैज्ञानिक आधार और वास्तविक डेटा के साथ समर्पित आयोग बनेगा तभी OBC आरक्षण वैध होगा। पुराने आंकड़ों से चुनाव कराए गए तो फिर कोर्ट में रद्द होने का खतरा रहेगा। सरकार इस बार कानूनी विवाद से बचना चाहती है।

आरक्षण का गणित कितना पेचीदा?

आपको बता दें कि प्रदेश में सीट आरक्षण तय करना आसान नहीं:

SC : लगभग 20.7%

ST : लगभग 0.56%

OBC : अनुमानित 27% (पुराने सर्वे के आधार पर)

लेकिन अब आबादी बदली है इसलिए नया सर्वे के साथ नई सीटों की मैपिंग व नया चुनाव शेड्यूल बनाया जाएगा।

राजनीतिक वजह भी मानी जा रही :

गौरतलब है कि सूत्रों के मुताबिक राजनीतिक समीकरण भी अहम हैं। पंचायत चुनाव में कार्यकर्ताओं की आपसी लड़ाई बढ़ती है। बगावत विधानसभा चुनाव को प्रभावित कर सकती है। इसलिए 2021 के अनुभव से सरकार सावधान है। यानी चुनाव टलना सिर्फ कानूनी नहीं, रणनीतिक भी माना जा रहा है।

अगर चुनाव टले तो क्या होगा?

विदित है कि मई-जुलाई में हजारों जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म होगा। जिसमें ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष शामिल है। अगर चुनाव नहीं हुए तो वहां सरकार वहां प्रशासक (रिसीवर) नियुक्त करेगी।

अब आगे क्या?

आपको बता दें कि अब पूरी नजर इन 3 चीजों पर रहेगी:

  1. OBC आयोग का गठन

  2. राज्यव्यापी सर्वे

  3. आरक्षण सूची की घोषणा

इनके बाद ही चुनाव की तारीख तय होगी।

मतलब साफ है इस बार पंचायत चुनाव सिर्फ वोट का मामला नहीं; डेटा, कानून और राजनीति तीनों का समीकरण बन गया है। पहले गिनती होगी फिर बंटवारा और आखिर में मतदान। गांव की सत्ता का फैसला अब जल्दी नहीं बल्कि सही तरीके से होगा।

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