फ़िल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर बवाल के बाद झुके मेकर्स!: बदलेगा नाम, हटाया गया पूरा प्रमोशन, मायावती और कांग्रेस ने भी दर्ज की थी आपत्ति, जानें कोर्ट में क्या हुआ? पूरा मामला_एक नजर
फ़िल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर बवाल के बाद झुके मेकर्स!

बॉलीवुड/ नई दिल्ली : रिलीज से पहले ही विवादों में घिरी नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ को लेकर आखिरकार मेकर्स को पीछे हटना पड़ा। दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान निर्माताओं ने साफ कहा कि फिल्म का नाम बदला जाएगा और पूरा प्रमोशनल कंटेंट सोशल मीडिया से हटा दिया गया है। इसके बाद अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया। लेकिन इस पूरे विवाद ने सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री नहीं, बल्कि राजनीति और सामाजिक संगठनों को भी आमने-सामने ला दिया।

क्या था पूरा विवाद?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फिल्म के शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समुदाय और कई संगठनों ने कड़ा विरोध जताया। उनका आरोप था कि “पंडित” शब्द को “घूसखोर” जैसे नकारात्मक शब्द से जोड़ना एक पूरे समुदाय की छवि खराब करता है और सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है। याचिका में मांग की गई थी फिल्म की रिलीज रोकी जाए, ऑनलाइन स्ट्रीमिंग पर रोक लगे, और फ़िल्म का शीर्षक बदला जाए। मामला सीधे दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया।

कोर्ट में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान मेकर्स ने अदालत को आश्वासन दिया कि फिल्म का नाम बदला जाएगा। सभी पोस्टर, टीज़र और प्रमोशनल सामग्री हटाई जा चुकी है। इसके बाद अदालत ने कहा कि अब विवाद का कारण खत्म हो गया है, इसलिए याचिका का निपटारा किया जाता है। यानी बैन नहीं लगा, लेकिन नाम बदलना पड़ा।

कलाकारों को भी देनी पड़ी सफाई :

विदित है कि फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे अभिनेता ने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि कहानी किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं थी, बल्कि एक व्यक्ति के चरित्र की कहानी थी। उन्होंने लोगों की भावनाओं का सम्मान करने की बात कही और मेकर्स के फैसले का समर्थन किया।

राजनीति भी कूदी मैदान में :

गौरतलब है कि विवाद सिर्फ अदालत तक सीमित नहीं रहा, राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गईं। कुछ नेताओं ने फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की। कुछ ने नाम बदलने की अपील की। कुछ ने कहा विवाद संवाद से सुलझे, केस से नहीं यानी फिल्म रिलीज से पहले ही राष्ट्रीय बहस बन गई।

मायावती ने भी दिया था तीखा बयान :

आपको बता दें कि इस मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि फिल्मों में “पंडित” शब्द को नकारात्मक तरीके से दिखाना पूरे ब्राह्मण समाज का अपमान है। उन्होंने केंद्र सरकार से फिल्म पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग भी उठाई और कहा कि इससे समाज में रोष फैल रहा है।

कांग्रेस ने भी जताई थी आपत्ति :

विदित है कि कांग्रेस नेताओं ने भी नाम पर आपत्ति जताई, लेकिन उनका रुख थोड़ा अलग रहा। उन्होंने कहा कि कला जरूरी है, लेकिन किसी की भावना आहत करके नहीं। विवाद का समाधान बातचीत से होना चाहिए। सीधे एफआईआर करना ठीक तरीका नहीं। यानी कांग्रेस ने नाम बदलने का समर्थन किया, पर दंडात्मक कार्रवाई पर सवाल उठाए।

मानवाधिकार पक्ष की चिंता :

गौरतलब है कि इस मामले में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मुद्दे को सामाजिक तनाव से जोड़ते हुए कहा कि फिल्मों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल संवेदनशील समाज में टकराव पैदा कर सकता है, इसलिए जिम्मेदारी जरूरी है। उनका जोर प्रतिबंध से ज्यादा संतुलन और संवेदनशीलता पर रहा।

आखिर झुकना क्यों पड़ा?

आपको बता दें कि मेकर्स के झुकने का कारण साफ निम्नलिखित था।

●सामाजिक आक्रोश
●कानूनी जोखिम
●प्लेटफॉर्म की छवि
●संभावित रिलीज संकट

मेकर्स ने समझौता कर विवाद खत्म करना बेहतर समझा।

अब आगे क्या?

आपको बता दें कि फिल्म रिलीज होगी लेकिन अब नए नाम से। नई पहचान के साथ वही कहानी दर्शकों के सामने आएगी।

यह मामला दिखाता है कि आज फिल्मों में सिर्फ कहानी नहीं चलती, समाज की संवेदनाएं भी उतनी ही बड़ी सेंसर बन चुकी हैं। यह मामला सिर्फ एक फिल्म का नहीं, बल्कि बदलते दौर का संकेत है। अब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी बन चुका है। कहानी वही रहेगी, लेकिन पहचान नई होगी।

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