यूपी में पंचायत चुनाव पर सस्पेंस बरकरार!: मार्च-अप्रैल में नहीं हो सकेंगे चुनाव, इस महीने तक टली प्रक्रिया, जानें कब तक हो सकते चुनाव और देरी की प्रमुख वजह?
यूपी में पंचायत चुनाव पर सस्पेंस बरकरार!

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे नेताओं और दावेदारों को बड़ा झटका लगा है। अब यह लगभग साफ हो गया है कि मार्च-अप्रैल में पंचायत चुनाव कराना नामुमकिन है। मौजूदा हालात और सरकारी तैयारियों को देखते हुए चुनाव जून से पहले होना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

जानें क्या है सबसे बड़ी वजह?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस देरी की सबसे बड़ी वजह है कि ओबीसी आरक्षण के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का अब तक गठन न होना। बिना आयोग की रिपोर्ट के पंचायत चुनाव कराना कानूनी तौर पर संभव नहीं है, और यही कारण है कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया अटकती नजर आ रही है।

ओबीसी आयोग नहीं बना, चुनाव का समय रुका :

गौरतलब है कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सरकार को समर्पित आयोग की रिपोर्ट जरूरी है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि फरवरी खत्म होने को है और आयोग का गठन तक नहीं हुआ। मान लिया जाए कि फरवरी में आयोग बन भी जाता है, तो आयोग को रिपोर्ट देने में कम से कम 2 महीने लगेंगे, इसके बाद सीटों का आरक्षण तय करने में करीब 1 महीना फिर राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने के लिए कम से कम 35 दिन लगेंगे। यानी, सारी गणनाएं मिलाकर देखें तो जून से पहले चुनाव की अधिसूचना आना लगभग असंभव है।

पंचायती राज विभाग भी सुस्त, कहीं हलचल नहीं :

विदित है कि पंचायत चुनाव को लेकर न तो पंचायती राज निदेशालय में कोई खास गतिविधि दिख रही है और न ही शासन स्तर पर कोई तेज़ी। हालांकि, पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर बार-बार यह कहते जरूर हैं कि सरकार जल्द चुनाव कराना चाहती है, लेकिन कैसे और कब इसका कोई ठोस रोडमैप सामने नहीं आया है। राजभर का कहना है कि मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव पूरा होना मुश्किल है, लेकिन जून तक चुनाव कराए जा सकते हैं। वहीं, वे एसआईआर और जनगणना जैसे मुद्दों का हवाला देकर प्रक्रिया को और जटिल बता रहे हैं।

मतदाता सूची तैयार, फिर भी चुनाव दूर :

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 28 फरवरी को हो जाएगा। जिलों में मतपत्र भी छप चुके हैं। लेकिन असली सवाल यही है कि जब आयोग ही नहीं बना, तो यह सारी तैयारी किस काम की?

क्या विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव? सियासी चर्चा तेज :

विदित है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि सरकार पंचायत चुनाव को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद कराना चाहती है, ताकि पंचायत चुनाव के नतीजों का असर विधानसभा चुनाव पर न पड़े। अगर ऐसा हुआ, तो यह संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिहाज से बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।

कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी :

आपको बता दें कि सरकार की ढुलमुल नीति को देखते हुए मामला अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। हाईकोर्ट में पहले ही एक याचिका दाखिल की जा चुकी है, जिसमें समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में देरी को चुनौती दी गई है। सूत्रों की मानें तो जैसे ही पंचायतों का कार्यकाल खत्म होगा, नई याचिकाओं की बाढ़ आ सकती है। पिछले अनुभव बताते हैं कि नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव समय पर न कराने के मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक सख्त रुख अपना चुका है। ऐसे में सरकार के पास कोर्ट के आदेश के आगे झुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

2021 की याद दिला रहे हालात :

गौरतलब है कि वर्ष 2021 में राज्य निर्वाचन आयोग ने 26 मार्च को पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी थी। अप्रैल में चार चरणों में मतदान हुआ और मई-जून में पंचायतों की पहली बैठकें भी हो गई थीं। लेकिन इस बार हालात बिल्कुल उलट हैं; न आयोग, न अधिसूचना, न तारीख।

सब मिलाकर चुनाव तय हैं, तारीख नहीं। पंचायत चुनाव टलेंगे नहीं, लेकिन कब होंगे। यह अब सरकार नहीं, शायद अदालत तय करेगी। फिलहाल इतना साफ है कि मार्च-अप्रैल में पंचायत चुनाव की उम्मीद छोड़ दीजिए, और जून भी अभी सिर्फ एक संभावित तारीख भर है।

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