क्वेटा/बलूचिस्तान/पाकिस्तान: पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन ने अब संघर्ष को एक नए स्तर पर ले जाने का दावा किया है। उन्होंने पाकिस्तान को एक और बड़े झटके देने की तैयारी कर ली हैं। बलूच नेताओं की ओर से कहा गया है कि जिन इलाकों पर उनका प्रभाव या नियंत्रण है, वहां सार्वजनिक स्थानों से पाकिस्तान से जुड़े नाम और प्रतीक हटाए जाएंगे। इनकी जगह बलूचिस्तान के इतिहास, संस्कृति, भूगोल और स्थानीय राष्ट्रीय नायकों से जुड़े नाम दिए जाएंगे। विदेश में रह रहे बलूच नेता मीर यार बलूच की ओर से इस संबंध में जानकारी सामने आई है। उनके दावे के मुताबिक यह केवल कुछ सड़कों के नाम बदलने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थानों और स्थानों की पहचान की समीक्षा की जाएगी।
जिन्ना रोड से इकबाल रोड तक बदलेंगे नाम?
आपको बता दें कि प्रस्तावित योजना के तहत उन सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नामों की समीक्षा की जाएगी, जिन्हें बलूच नेता पाकिस्तान या पूर्व विदेशी शासन की पहचान से जोड़कर देखते हैं। इनमें जिन्ना रोड, फातिमा जिन्ना रोड और इकबाल रोड जैसे नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। बलूच नेताओं का कहना है कि ऐसे नामों की जगह बलूचिस्तान के प्राचीन इतिहास, स्थानीय भूगोल, संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के नाम रखे जाएंगे। यानी अगर यह योजना जमीन पर लागू होती है तो क्वेटा समेत बलूचिस्तान के कई हिस्सों में लोगों को सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के पुराने नाम बदलते हुए दिखाई दे सकते हैं।
सिर्फ सड़कें नहीं, एयरपोर्ट और बंदरगाह भी निशाने पर
गौरतलब है कि बलूच नेताओं के दावे के मुताबिक अभियान का दायरा काफी बड़ा होगा। अस्पताल, हवाई अड्डे, बंदरगाह, हाईवे, स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, पार्क, सरकारी इमारतें और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के नामों की भी समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा बांधों, खनिज परियोजनाओं, गैस क्षेत्रों, तेल के कुओं, बैंकों, रिसॉर्ट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से जुड़े नामों को भी बदलने की बात कही गई है। इसका मतलब साफ है कि बलूच विद्रोही इसे केवल नाम बदलने की कवायद नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में पाकिस्तान से अलग पहचान स्थापित करने के प्रयास के तौर पर पेश कर रहे हैं।
‘आजादी’ के दावे के बाद बढ़ी हलचल
विदित है कि बलूचिस्तान में लंबे समय से पाकिस्तान सरकार के खिलाफ अलगाववादी गतिविधियां चलती रही हैं। बलूच विद्रोही संगठन पाकिस्तान से अलग स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग करते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलने की घोषणा को प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बलूच नेताओं का तर्क है कि किसी क्षेत्र की राष्ट्रीय पहचान केवल राजनीतिक सीमाओं से निर्धारित नहीं होती। भाषा, संस्कृति, इतिहास, प्रतीक और सार्वजनिक संस्थानों के नाम भी पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी सोच के आधार पर उनका दावा है कि पाकिस्तान से जुड़े प्रतीकों को हटाकर स्थानीय इतिहास और बलूच पहचान को प्रमुखता दी जाएगी।
कितना लागू होगा यह फैसला?
हालांकि, इस पूरे दावे को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल भी है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का प्रांत है और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था पर पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण बना हुआ है। ऐसे में विद्रोहियों द्वारा घोषित नाम परिवर्तन को वास्तविक सरकारी स्तर पर लागू कर पाना अलग चुनौती है। इसलिए फिलहाल इसे बलूच अलगाववादी नेतृत्व की ओर से किया गया दावा और राजनीतिक-सांकेतिक घोषणा माना जाना चाहिए। जमीन पर कितने स्थानों के नाम वास्तव में बदले जाते हैं और इसका प्रशासनिक स्वरूप क्या होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फिर भी, अगर यह अभियान बड़े पैमाने पर आगे बढ़ता है तो इसका संदेश केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं रहेगा। यह पाकिस्तान और बलूच अलगाववादियों के बीच चल रहे संघर्ष में पहचान और प्रतीकों की लड़ाई को भी नई दिशा दे सकता है।