इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्या हुआ ऐसा कि जज बोले- 'आज इतिहास का काला दिन'!: 900 करोड़ के कोडीन सिरप केस के 80 से ज्यादा जमानत मामलों से खुद को किया अलग, HC बोला- 'यह न्यायपालिका पर हमला'...जानें क्या है पूरा मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्या हुआ ऐसा कि जज बोले- 'आज इतिहास का काला दिन'!

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट में कोडीन युक्त कफ सिरप तस्करी से जुड़े बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने न्यायिक व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कहा कि फैसला सुरक्षित रखने से पहले कुछ पक्षकारों द्वारा उनसे निजी तौर पर संपर्क बनाने की कोशिश की गई। इसे उन्होंने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सीधा हमला बताते हुए "हाईकोर्ट के इतिहास का काला दिन" करार दिया। इस टिप्पणी के बाद न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने मुख्य आरोपी भोला जायसवाल समेत 80 से अधिक जमानत याचिकाओं की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया और सभी मामलों को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया, ताकि इन्हें किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सके।

क्या हुआ था सुनवाई के दौरान?

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गुरुवार को कोडीन कफ सिरप मामले में बड़ी संख्या में जमानत याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होनी थी। अदालत में आरोपियों की ओर से अधिवक्ता और राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ विधि अधिकारी मौजूद थे। सुनवाई शुरू होते ही न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कहा कि बहस पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन उससे पहले कुछ लोगों ने पीठासीन न्यायाधीश तक निजी माध्यमों से पहुंच बनाने का प्रयास किया। अदालत ने इसे न्यायिक मर्यादा के विरुद्ध बताते हुए बेहद गंभीर माना।

'इतिहास का काला दिन' क्यों कहा?

न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कहा कि यदि किसी न्यायाधीश तक निजी संपर्क स्थापित करने जैसी घटनाओं को नजरअंदाज किया गया, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर होगी और आम लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए कि फैसला पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से दिया गया है। अदालत ने इस पूरी घटना को न्यायपालिका के इतिहास का अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण क्षण बताते हुए "काला दिन" कहा।

फैसले पर संदेह पैदा हो सकता था

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी परिस्थितियों के बाद किसी पक्ष के पक्ष में आदेश पारित होता, तो भले ही वह कानूनी रूप से पूरी तरह सही होता, फिर भी लोगों के मन में यह संदेह पैदा हो सकता था कि फैसला न्यायिक विवेक के बजाय किसी बाहरी प्रभाव का परिणाम है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्षों में बनी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को किसी भी प्रकार के संदेह के घेरे में नहीं आने दिया जा सकता।

सभी जमानत याचिकाएं दूसरी बेंच को भेजीं

इस पूरे घटनाक्रम के बाद न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने स्वयं को सभी संबंधित मामलों की सुनवाई से अलग कर लिया। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी जमानत याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की जाएं, ताकि उन्हें किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सके। अब इन मामलों की आगे की सुनवाई नई बेंच करेगी।

कोर्ट ने दी कड़ी चेतावनी

अदालत ने कहा कि किसी लंबित मुकदमे में न्यायाधीश तक निजी माध्यमों से पहुंचने या संपर्क स्थापित करने की कोशिश न्यायिक नैतिकता, अधिवक्ता आचरण और संविधान में निहित न्यायपालिका की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा है। इसलिए इसे प्रभावित करने की हर कोशिश की कड़ी निंदा होनी चाहिए।

क्या है पूरा कोडीन कफ सिरप मामला?

यह मामला करोड़ों रुपये के कथित अवैध कोडीन युक्त कफ सिरप कारोबार से जुड़ा है। जांच एजेंसियों के अनुसार इस नेटवर्क के तार कई राज्यों तक फैले हुए हैं। मुख्य आरोपी शुभम जायसवाल को फरार घोषित किया जा चुका है, जबकि उसके पिता भोला जायसवाल समेत कई अन्य आरोपी न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। जांच के दौरान कई फर्जी फर्मों, मेडिकल स्टोरों और कथित अवैध खरीद-बिक्री के नेटवर्क का भी खुलासा हुआ है। इस मामले में पहले प्राथमिकी रद्द कराने की याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। अग्रिम जमानत की मांग भी अदालत स्वीकार नहीं कर चुकी है। अब नियमित जमानत याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, जिसके दौरान यह अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आया।

अब आगे क्या होगा?

अब सभी संबंधित जमानत याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश के आदेश के बाद नई पीठ को सौंपी जाएंगी। वहीं, गुरुवार को न्यायमूर्ति कृष्ण पहल द्वारा की गई टिप्पणी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को लेकर देशभर में नई बहस छेड़ दी है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल जमानत याचिकाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की निष्पक्षता और उस पर जनता के विश्वास को बनाए रखने से भी जुड़ा हुआ है।

अन्य खबरे