देहरादून: उत्तराखंड में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर धामी सरकार के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है। अब स्कूल के रूप में मान्यता प्राप्त मदरसों में शुक्रवार के बजाय रविवार को साप्ताहिक छुट्टी रखने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का तर्क है कि जब ये संस्थान स्कूल के रूप में मान्यता ले रहे हैं, तो उन्हें भी शिक्षा विभाग के निर्धारित नियमों और शैक्षणिक कैलेंडर के अनुसार चलना होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सभी बच्चों को बेहतर शिक्षा देने और नियमों के समान पालन पर जोर दिया है। लेकिन इस फैसले के साथ ही एक बड़ा सवाल भी सामने आया है कि जब प्रदेश में मदरसों की मान्यता और संचालन की व्यवस्था बदल रही है, तो वहां पढ़ने वाले हजारों बच्चों की शिक्षा का क्या होगा? मदरसों की संख्या, मान्यता और बंद किए गए संस्थानों से जुड़े आंकड़ों ने इस मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
452 से 76 संस्थानों को मिली मान्यता, 114 आवेदन लंबित
गौरतलब है कि नई व्यवस्था के तहत मदरसों को स्कूल के रूप में मान्यता लेने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पहले मदरसा बोर्ड से 452 संस्थान मान्यता प्राप्त थे। अब तक 76 संस्थानों को नई व्यवस्था के तहत स्कूल के रूप में मान्यता दी गई है, जबकि 114 आवेदन शिक्षा विभाग के पास लंबित बताए गए हैं। जिलावार आंकड़ों में हरिद्वार में 270 में से 44, ऊधमसिंह नगर में 119 में से 24, देहरादून में 41 में से 6 और नैनीताल में 18 में से 2 संस्थानों को मान्यता मिलने की जानकारी दी गई है। इन चार जिलों के आंकड़ों में कुल 448 संस्थान शामिल हैं।
250 मदरसे सील, बच्चों की पढ़ाई पर सवाल
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, पहले चरण में 250 ऐसे मदरसों को सील किया गया, जो आवश्यक पंजीकरण या अनुमति के बिना संचालित हो रहे थे। अधिकारियों का कहना है कि इन संस्थानों के संचालन में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था। इस कार्रवाई के बाद बच्चों की पढ़ाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पहले प्रदेश के मदरसों में करीब 30 हजार बच्चे इस्लामिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि बंद संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों का दाखिला दूसरे स्कूलों में कराया गया है या उनकी पढ़ाई के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई गई है। इस संबंध में स्पष्ट और विस्तृत जानकारी सामने आना जरूरी है।
मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड
सरकार ने मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड की व्यवस्था लागू की है। इसका दायरा मुस्लिम समुदाय के अलावा सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों तक बढ़ाने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार का उद्देश्य इन संस्थानों को निर्धारित शैक्षणिक पाठ्यक्रम और नियामकीय नियमों के अनुरूप संचालित करना है।
मान्यता के लिए 11 शर्तें पूरी करनी होंगी
गौरतलब है कि नई व्यवस्था में संस्थानों को मान्यता पाने के लिए कई शर्तें पूरी करनी होंगी। इनमें सोसायटी के रूप में पंजीकरण, जमीन का सोसायटी के नाम होना, संस्थान के बैंक खाते से लेनदेन, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षा परिषद से संबद्धता और नियमित ऑडिट जैसी आवश्यकताएं शामिल हैं। इसके साथ ही खेल मैदान, प्रशिक्षित शिक्षक, सामाजिक सद्भाव बनाए रखने और प्राधिकरण के निर्देशों का पालन करने पर भी जोर दिया गया है।
सरकार के फैसले पर राजनीतिक और सामाजिक बहस
मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि सरकार सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहती है और नियमों का पालन हर शिक्षण संस्थान के लिए जरूरी है। दूसरी ओर, इस्लामिक मामलों के जानकार खुर्शीद अहमद ने मान्यता प्राप्त संस्थानों की संख्या और बंद मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने भी साप्ताहिक छुट्टी बदलने के फैसले पर आपत्ति जताई है।
अब सबकी नजर लंबित 114 आवेदनों पर होने वाले फैसले और बंद संस्थानों के विद्यार्थियों की शिक्षा व्यवस्था पर है। रविवार की छुट्टी लागू करने का फैसला इस व्यापक बदलाव का एक हिस्सा है, लेकिन इसकी असली परीक्षा इस बात से होगी कि नियमों के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई और उनका शैक्षणिक भविष्य किस तरह सुरक्षित रखा जाता है।