नेपाल की बाढ़ के बाद भारत के इन राज्यों पर मंडराया बड़ा खतरा!: कोसी-घाघरा समेत कई नदियां मचा सकती भारी तबाही, वहीं मलबा समेत...जानें पूरी खबर
नेपाल की बाढ़ के बाद भारत के इन राज्यों पर मंडराया बड़ा खतरा!

नई दिल्ली: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। पहली नजर में मामला सिर्फ सीमा पार से आने वाले पानी का लगता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक असली खतरा इससे कहीं ज्यादा जटिल है। नेपाल और भारत एक ही हिमालयी नदी तंत्र का हिस्सा हैं। पहाड़ों में होने वाली भारी बारिश, भूस्खलन, ग्लेशियर और मलबे का असर कुछ ही घंटों या दिनों में भारतीय मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है।

नेपाल की नदियों का पानी भारत तक पहुंचता है

आपको बता दें कि नेपाल में हजारों छोटी-बड़ी नदियां हैं और इनमें से अधिकांश दक्षिण की ओर बहते हुए भारत में प्रवेश करती हैं। कोसी, गंडक, घाघरा, बागमती, कमला, राप्ती और महाकाली जैसी नदियां दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन नदियों का पानी नेपाल के पहाड़ी इलाकों से निकलकर भारत के मैदानी क्षेत्रों में पहुंचता है। यही वजह है कि नेपाल में होने वाली अत्यधिक बारिश का सीधा असर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों पर पड़ सकता है।

बिहार सबसे ज्यादा खतरे में

गौरतलब है कि भारत में नेपाल की बाढ़ का सबसे बड़ा असर बिहार में दिखाई देता है। उत्तर बिहार की कई प्रमुख नदियां नेपाल से आती हैं। कोसी नदी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है। इसके अलावा गंडक, बागमती और कमला जैसी नदियां भी बाढ़ का बड़ा कारण बनती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश भी जोखिम से बाहर नहीं है। घाघरा, राप्ती और गंडक के बढ़ते जलस्तर से गोरखपुर, बहराइच, श्रावस्ती और लखीमपुर खीरी जैसे इलाकों में खतरा बढ़ सकता है। उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से भी सीमा पार नदियों के प्रभाव में आते हैं।

सिर्फ नेपाल को जिम्मेदार ठहराना गलत

विशेषज्ञों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेपाल में बाढ़ आने का मतलब यह नहीं कि भारत में भी उसी अनुपात में तबाही होगी। भारतीय हिस्से की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत में उस समय कितनी बारिश हो रही है, गंगा और दूसरी नदियों का जलस्तर क्या है, तटबंध कितने मजबूत हैं और जल निकासी की व्यवस्था कैसी है—इन सभी चीजों पर बाढ़ का असर निर्भर करता है। यानी नेपाल की बारिश बाढ़ का पानी बढ़ा सकती है, लेकिन भारत में वह पानी कितनी बड़ी आपदा बनेगा, यह दोनों देशों की परिस्थितियों से तय होता है।

2008 की कोसी आपदा से मिला बड़ा सबक

विदित है कि 2008 की कोसी त्रासदी इसका बड़ा उदाहरण है। उस समय तटबंध टूटने के बाद बिहार के बड़े इलाके में पानी फैल गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक यह सिर्फ असाधारण जलप्रवाह की कहानी नहीं थी, बल्कि तटबंध की कमजोरी और रखरखाव से जुड़े सवाल भी सामने आए थे। इस घटना ने साबित किया कि नदी के साथ-साथ तटबंध, जल निकासी और नदी प्रबंधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

चेतावनी के लिए समय बहुत कम

आपको बता दें कि सामान्य बाढ़ की स्थिति में भारत को परिस्थितियों के अनुसार करीब 12 घंटे से दो दिन तक की चेतावनी मिल सकती है। लेकिन चुरे क्षेत्र से अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन या मलबे का प्रवाह कुछ ही घंटों में भारी नुकसान कर सकता है। दोनों देशों के बीच बारिश और नदी के जलस्तर का डेटा साझा किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि निगरानी नेटवर्क, साझा पूर्वानुमान और स्थानीय स्तर तक चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है।

असली खतरा सिर्फ पानी नहीं, मलबा भी

हिमालय में बढ़ता तापमान और बारिश के बदलते पैटर्न ने खतरा और बढ़ा दिया है। तेज बारिश के साथ जब पानी में मिट्टी, पत्थर और भारी मलबा शामिल हो जाता है, तो यह सामान्य बाढ़ से कहीं ज्यादा विनाशकारी हो सकता है। 2021 की चमोली आपदा और 2025 की धराली आपदा ने भी दिखाया कि पहाड़ों में पानी और मलबे का अचानक आया सैलाब कितनी तेजी से तबाही मचा सकता है।

इसलिए नेपाल की हालिया बाढ़ भारत के लिए सिर्फ पड़ोसी देश की आपदा नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी नदी तंत्र के बदलते खतरे की चेतावनी है। इसका जवाब आरोप-प्रत्यारोप में नहीं, बल्कि भारत-नेपाल के बीच बेहतर डेटा साझाकरण, मजबूत तटबंध, आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली और संयुक्त नदी प्रबंधन में छिपा है।

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