देहरादून: पहाड़ों में तेजी से बदलते मौसम और हिमनद झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे को देखते हुए उत्तराखंड में अब आपदा से पहले चेतावनी देने की तैयारी तेज हो गई है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की ने हिमनद झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया है। करीब तीन साल से इस तकनीक पर काम चल रहा था और अब इसके जमीनी परीक्षण की तैयारी शुरू हो गई है। इस सिस्टम का पहला पायलट प्रोजेक्ट चमोली जिले की वसुंधरा झील में लगाए जाने की योजना है। राज्य सरकार की ओर से इसके परीक्षण को अनुमति मिल गई है। सीबीआरआई की टीम इसी महीने वसुंधरा झील पहुंचकर आवश्यक उपकरण लगाने की तैयारी में है।
खतरा बढ़ने से पहले मिलेगी जानकारी
आपको बता दें कि हिमनद झीलें पहाड़ों में बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से बनती हैं। इनमें बड़ी मात्रा में पानी जमा रहता है। यदि किसी प्राकृतिक घटना, भूस्खलन या अन्य कारण से झील की सीमा टूटती है और अचानक पानी नीचे की ओर बहने लगता है, तो इससे निचले इलाकों में भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में अर्ली वार्निंग सिस्टम का उद्देश्य संभावित खतरे के संकेतों को समय रहते पकड़ना और संबंधित एजेंसियों तक सूचना पहुंचाना है। इससे प्रशासन को प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सतर्क करने और जरूरत पड़ने पर बचाव की तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
वसुंधरा झील से होगी तकनीक की असली परीक्षा
गौरतलब है कि सीबीआरआई द्वारा तैयार सिस्टम को पहले वसुंधरा झील में लगाकर उसकी कार्यक्षमता जांची जाएगी। यहां से मिलने वाले आंकड़ों और सूचनाओं का अध्ययन किया जाएगा। इससे यह पता चलेगा कि सिस्टम वास्तविक पहाड़ी परिस्थितियों में कितना प्रभावी ढंग से काम करता है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के अनुसार, सीबीआरआई की टीम इसी महीने उपकरण लगाने की दिशा में काम करेगी। वसुंधरा झील पर सिस्टम के प्रदर्शन से मिलने वाले अनुभव के आधार पर आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।
उत्तराखंड की 13 संवेदनशील झीलों पर नजर
राज्य में कुल 13 संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान की गई है। ये पांच जिलों में स्थित हैं। इनमें पांच झीलें ए श्रेणी, चार बी श्रेणी और चार सी श्रेणी में रखी गई हैं। अब तक चार हिमनद झीलों का सर्वे पूरा किया जा चुका है। इसके अलावा इस साल केदारताल और सरस्वती ताल के अध्ययन की भी योजना है। सरकार की तैयारी सभी संवेदनशील झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की है।
दो अलग तकनीकों की होगी तुलना
खास बात यह है कि उत्तराखंड में सिर्फ एक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय दो प्रणालियों को आजमाने की तैयारी है। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार सीबीआरआई के अलावा सी-डैक के माध्यम से भी अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने की योजना है। दोनों प्रणालियों से मिलने वाले परिणामों की तुलना की जाएगी। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि हिमनद झीलों की निगरानी और संभावित खतरे की चेतावनी के लिए कौन-सी व्यवस्था ज्यादा प्रभावी साबित होती है।
अगले साल बाकी झीलों पर बढ़ेगा दायरा
विदित है कि वसुंधरा झील पर पायलट प्रोजेक्ट से मिलने वाले आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अधिकारियों के मुताबिक अगले वर्ष अप्रैल-मई के दौरान अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी सिस्टम लगाने की दिशा में काम आगे बढ़ाया जाएगा।
इस पूरी कवायद का मकसद एक ही है कि हिमनद झील में खतरा पैदा होने और निचले इलाकों में तबाही पहुंचने के बीच मिलने वाले समय का बेहतर इस्तेमाल करना। अगर सिस्टम समय रहते विश्वसनीय चेतावनी देने में सफल रहा, तो यह उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन व्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।