तिलक-बिंदी' विवाद के बाद Lenskart ने बदली अपनी पॉलिसी!: सोशल मीडिया के दबाव में बड़ा यू-टर्न, अब धार्मिक पहचान...जानें क्या था पूरा विवाद और क्या हैं कंपनी की नई गाइडलाइन्स_एक नजर
तिलक-बिंदी' विवाद के बाद Lenskart ने बदली अपनी पॉलिसी!

बिज़नेस/मुंबई : देश की जानी-मानी आईवियर कंपनी Lenskart एक बड़े विवाद के बाद बैकफुट पर आ गई है। सोशल मीडिया पर उठे “तिलक-बिंदी बैन” के आरोपों ने ऐसा तूफान खड़ा किया कि कंपनी को तुरंत अपनी इन-स्टोर स्टाइल गाइड बदलनी पड़ी। अब कंपनी ने साफ कर दिया है कि कोई भी धार्मिक प्रतीक पहनने पर कोई रोक नहीं है।

क्या था पूरा विवाद?

आपकी जानकारी के लिये बता दें कि मामला तब भड़का जब सोशल मीडिया पर एक कथित “स्टाइल गाइड” वायरल हुआ। आरोप लगे कि यहाँ बिंदी, तिलक, सिंदूर, कलावा पर रोक है लेकिन हिजाब की अनुमति नहीं होगी। इससे यूजर्स में गुस्सा फैल गया और कंपनी पर धार्मिक भेदभाव के आरोप लगने लगे।

सोशल मीडिया के दबाव में बड़ा यू-टर्न

गौरतलब है कि विवाद बढ़ता देख कंपनी को सामने आना पड़ा। Peyush Bansal और कंपनी दोनों ने सफाई दी कि वायरल डॉक्यूमेंट पुराना और गलत संदर्भ वाला था और यह मौजूदा पॉलिसी नहीं थी। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका कंपनी ने तुरंत नई स्टाइल गाइड जारी कर दी।

जानें क्या है नई गाइडलाइन; अब ‘सबको आज़ादी’

नई नीति में साफ लिखा गया कर्मचारी पहन सकते हैं:

  • बिंदी, तिलक, सिंदूर
  • कलावा, मंगलसूत्र
  • कड़ा, पगड़ी
  • हिजाब और अन्य धार्मिक प्रतीक

कंपनी ने कहा कि यह अपवाद नहीं, हमारी पहचान है।

कंपनी का बड़ा संदेश

कंपनी ने अपने बयान में कहा कि “हमारे स्टोर्स भारत के लोगों द्वारा चलाए जाते हैं, हम किसी से उसकी आस्था दरवाजे पर छोड़ने को नहीं कह सकते” अगर किसी को ठेस पहुंची है तो कंपनी सार्वजनिक माफी भी मांगती है।

क्यों इतना बड़ा मुद्दा बना?

विदित है कि यह सिर्फ ड्रेस कोड का मामला नहीं था, बल्कि धार्मिक समानता, वर्कप्लेस में पहचान, सोशल मीडिया की ताकत इन सभी का मिला-जुला असर था।

ब्रांड इमेज पर असर

विशेषज्ञ मानते हैं ऐसे विवाद ब्रांड की छवि को सीधे प्रभावित करते हैं खासकर भारत जैसे विविधता वाले देश में इसलिए कंपनी ने तुरंत “डैमेज कंट्रोल” किया।

यह पूरा मामला दिखाता है कि आज के दौर में सोशल मीडिया सबसे बड़ा दबाव तंत्र है और कंपनियों को संवेदनशील मुद्दों पर बेहद सतर्क रहना होगा। अब हर कंपनी को यह समझना होगा कि पहचान और आस्था से जुड़े मुद्दे सिर्फ नियम नहीं, भावना होते हैं।

अन्य खबरे